कहां महात्मा बुद्ध और कहां संत टरंम्प?

फोटो क्रेडिट: यादवेन्द्र

बुद्ध, मंटो एवं टरंम्प की कहानियां

पिछले सप्ताह यादवेन्द्र जी से बातचीत में मुझे पाकिस्तान की एक कहानी याद आ गई। बातचीत के संदर्भ के बारे में हम आगे बात करेंगे। पहले वो कहानी।

पाकिस्तान के सीमावर्ती गांव में एक चौपाल पर कुछ लोग जमा थे। परेशान थे यह जानकर कि भारत ने सिंधू नदी के पानी पर रोक लगा दी है। हालांकि ये केवल एक अफवाह थी। इसमें कोई सच्चाई नहीं थी। लेकिन वे इसे सच मानकर दुखी थे। वे सोच रहे थे कि उनके फसलों का क्या होगा? पानी के बिना उनकी खेती बर्बाद हो जाएगी। कुछ लोग इस बात पर क्रोधित भी थे।

उनके बीच नत्थू चौधरी नामक एक छुटभैया नेता बार-बार भारत को गाली दिए जा रहा था।

तभी करीम नामक एक हट्टा-कट्टा व्यक्ति अचानक चौधरी के सामने उठ खड़ा हुआ। उसने ऊंची आवाज़ में कहा:

गाली मत दे चौधरी।

चौधरी पहले तो थोड़ा सहमा। फिर संभलकर वह बाकी लोगों की ओर मुड़ा और उन्हें सम्बोधित करते हुए कटाक्षपूर्ण लहज़े कहा,

देखो भाइओ, इसे भारत से कितना प्रेम है!

करीम की ओर देखकर पूछा,

क्यों नहीं दूं मैं गाली? वे तुम्हारे क्या लगते हैं?

करीम ने कहा कि वे हमारे दुश्मन हैं?

इसपर नत्थू ने पूछा कि तो फिर क्यों उनका बचाव क्यों कर रहे हो?

करीम का जवाब था कि दुश्मन को गाली देना या उसे कोसना हमारी कमज़ोरी की निशानी है। हम ऐसा तब करते हैं जब हमारे पास कोई विकल्प नहीं बचता। हमारा दुश्मन हमारे ख़िलाफ़ किस तरह के हथियार का प्रयोग करे। ये हम तय नहीं कर सकते। ये उसकी मर्जी है। पानी रोके या कुछ और करे। वह अपनी जगह पर सही है। हम उसे नहीं रोक सकते।

हमें उसके जवाब में सही हथियार के प्रयोग का विकल्प ढूंढना चाहिए। अपने दुश्मन को हम ये नहीं कह सकते कि हमारे ऊपर तुम बड़े बम क्यों गिरा रहे हो? या धारदार हथियार का उपयोग क्यों कर रहे हो? वैसे भी वह हमसे पूछकर कुछ नहीं करेगा। हमें उसका सही जवाब देना चाहिए। गाली नहीं। यह तो सरासर बेवकूफ़ी है।

यह एक काल्पनिक कहानी है जिसे प्रसिद्ध कथाकार मंटो ने भारत-पाकिस्तान बंटवारे के समय लिखा था। पर इस वर्ष मई के महीने में ऐसा लगने लगा कि ये सच का रूप धारण करने वाली है। भारत और पाकिस्तान दोनों सचमुच में युद्ध के कगार पर पहुंच चुके थे। और दोनों के बीच सिन्धु नदी के जल बंटवारे का मुद्दा सुर्खियों में था। सौभाग्य से युद्ध टल गया।

लेकिन इसके साथ ही अमरीका के राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रंप ने घोषणा कर दी कि युद्ध विराम उन्हीं के प्रयासों का फल है। ये बात वे आज भी बार-बार कह रहे हैं। इस आधार पर वे नोबेल शांति पुरस्कार विजेता बनने की राह पर चल पड़े हैं। शायद पुरस्कार उन्हें मिल भी जाए।

ट्रम्प साहब ने युद्ध रुकवाया या नहीं ये तो पता नहीं। पर उस दिन यादवेन्द्र ऐसी ही एक कहानी का जिक्र कर रहे थे जिसमें महात्मा बुद्ध ने एक युद्ध रुकवाया था। और वह भी नदी के जल बंटवारे से जुड़ी है।

लगभग 2500 वर्ष पूर्व रोहिणी नदी के दोनों तटों पर दो गणराज्य बसे थे। कपिलवस्तु और रामग्राम। वैसे तो आज भी रोहिणी नदी के दोनों ओर ये मौजूद हैं। पर वे कोई गणराज्य नहीं, बल्कि नेपाल देश की सीमा का हिस्सा हैं।

उस वक्त दोनों गणराज्यों के लोग रोहिणी के जल का उपयोग रोज़मर्रा की जरूरतों के अलावा सिंचाई, खेती वगैरह के लिए किया करते थे। नदी के जल को लेकर कपिलवस्तु और रामग्राम में विवाद की स्थिति बनी रहती थी। एक बार दोनों गणराज्य जब युद्ध के कगार पर पहुंच गए तो बुद्ध ने दोनों के बीच समझौता करवाया। उन्होंने युद्ध को टालने में मदद की थी।

बुद्ध की इसी कहानी के सच की खोज में भारत से साहित्यकारों का एक दल आजकल नेपाल में रोहिणी नदी की यात्रा पर हैं। यह दल रोहिणी के उद्गम से लेकर उसके साथ साथ एक लम्बी यात्रा तय करेंगे। यादवेन्द्र भी इस दल में शामिल हैं। पिछले सप्ताह यादवेन्द्र की इसी कहानी से मुझे सिन्धु जल विवाद से जुड़ी मंटो की कहानी का स्मरण हुआ।

कभी कभी लगता है कि कल्पना से सच्चाई का रिश्ता भी अजीब है। कौन सी कहानी कब सच दिखाई पड़ने लगे और कौन सी सच्चाई कब कल्पना में परिवर्तित हो जाए, कहना मुश्किल है।

मंटो की सिंधु जल बंटवारे की कहानी 70 वर्षों से भी ज्यादा पुरानी है। पर इस वर्ष वह सच के काफ़ी क़रीब दिख रही थी। उसी तरह बुद्ध की हज़ारों वर्ष पुरानी कहानी अब हमारी कल्पना का हिस्सा है। पर उस कल्पना लोक में विचरण करना हमें कितना अच्छा लगता है।

एक और विचार। मान लीजिए कि डॉनल्ड ट्रम्प को भारत-पाकिस्तान युद्ध रुकवाने के आधार पर इस वर्ष का नोबेल पुरस्कार मिल जाता है। और आज से पचास या सौ साल बाद उनके अनुयाई उन्हें एक महान संत के रूप में स्थापित कर देते हैं। उसके कुछ और वर्षों बाद उनके अनुयाइयों का एक दल भारत पाक सीमा पर सिन्धु नदी की यात्रा पर जाएं और संत ट्रम्प के इस महान कृत्य की गाथा गाएं।

Published by Arun Jee

Arun Jee is a literary translator from Patna, India. He translates poems and short stories from English to Hindi and also from Hindi to English. His translation of a poetry collection entitled Deaf Republic by a leading contemporary Ukrainian-American poet, Ilya Kaminski, was published by Pustaknaama in August 2023. Its title in Hindi is Bahara Gantantra. His other book is on English Grammar titled Basic English Grammar, published in April 2023. It is is an outcome of his experience of teaching English over more than 35 years. Arun Jee has an experience of editing and creating articles on English Wikipedia since 2009. He did his MA in English and PhD in American literature from Patna University. He did an analysis of the novels of a post war American novelist named Mary McCarthy for his PhD

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