
आज सुबह-सुबह जब मैं आशियाना नगर पार्क पहुंचा तो देखा कि चारों ओर कचरे बिखरे पड़े थे। पिछली शाम हुई पार्टी और भोज के कचरे। सुबह सैर करने वाले सहयात्री सब गायब थे। पूछने पर मालूम हुआ कि कचरों को देखकर वे भाग खड़े हुए। पास के एक पार्क में चले गए जो महर्षि व्यास के नाम पर है। कभी कभी लगता है कि नाम का भी कितना महत्व है। हमारा पार्क भी अगर किसी महर्षि के नाम से जुड़ा होता तो उसे ये दिन न देखना पड़ता।
खैर, मैंने ठान लिया कि मुझे नहीं हैं जाना और कहीं। मैं घूमूंगा अब यहीं। कचरे रहें अपनी जगह पर। मैं भी अपनी जगह बना लूंगा।
पार्क के इन कचरों के मूलतः दो प्रकार थे: जैविक और अजैविक। अजैविक कचरों से मुझे चिढ़ है। उनकी ओर मैं देखता भी नहीं। जैविक कचरे मुझे अपने से लगते हैं। उनके अपने रंग, रूप और गंध हैं। कचरे बनने के पहले भी और उसके बाद भी। भले आप उनके बाद के रूपों को नापसन्द करें। पर यही हाल तो हमारा भी होता है। जब-तक हमारी उपयोगिता है तब-तब हम हैं। नहीं तो हमारी भी वही दुर्गति। मिट्टी जैसी।
जैविक में ज्यादातर भात, दाल, रोटी या सब्जी के कचरे थे। मिठाइयों का नामोनिशान नहीं था। एक भी गुलाबजामुन या रसगुल्ला नहीं मिला। लगता है उन्हें अपना सही मुकाम मिल चुका था। पर बचे हुए कचरों की स्थिति दयनीय थी। मानों वे कह रहे हों कि मेरे साथ ही ये ज्यादती क्यों? पार्टी में तो मुझे भी बराबर का सम्मान मिला था। मेरी भी सजावट उतनी ही हुई थी। पर भोजन के वक्त लोगों ने हमारे साथ भेदभाव क्यों किया? हमें भी अपने मुकाम तक पहुंचने क्यों नहीं दिया गया? वे कह रहे थे:
“रहते थे कभी जिन के दिल में
हम जान से भी प्यारों की तरह
बैठे हैं उन्ही के कूचे में
हम आज गुनहगारों की तरह”
इन कचरों को देखकर मुझे पेरिस का वो पार्क याद आ रहा था जहां हम सुबह सैर के लिए गए थे। इसी वर्ष अक्टूबर के महीने में। आज वो पार्क कितना सुंदर दिखता है। वर्षों पहले वह भी कचरों का एक ढ़ेर था। उस पार्क के इतिहास के बारे में सोचकर मन सकारात्मक सोच से भर गया। लगा कि किसी भी पार्क की सुन्दरता भूतकाल में उसकी असुन्दरता पर निर्भर करती है। जिसका भूत जितना असुन्दर, भविष्य उतना ही सुन्दर। हमारे पार्क के पास तो भूत और वर्तमान दोनों हैं। इसलिए यह भविष्य में और भी सुंदर होगा। जरूर।
अगले पोस्ट में पेरिस के उस पार्क की बात होगी। उसकी असुन्दरता, सुन्दरता, नेपोलियन एवं राजतंत्र की क्रूरता की कहानी भी। इंतजार कीजिए…













