मैया की कहानी, मैया की जुबानी 8

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बाबूजी

बाबूजी पक्के गांधीवादी थे। वो स्वतन्त्रता आन्दोलन में काफी सक्रिय रहे थे। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान हमारे घर कई आन्दोलनकारी आते थे। रात के समय उनके लिए खाना बनता था। फिर बंगला(दालान) के भुसघरे(भूसा रखने की जगह) में छुपाकर उन्हें सुला दिया जाता था। उस समय मैं केवल आठ साल की थी। अपने घर में आन्दोलनकारीओं को छुपते हुए देखना मेरे लिए एक रोमांचकारी अनुभव था।

महात्मा गांधी ने जब शराबबंदी का आह्वान किया था तो बाबूजी और कई अन्य लोगों ने मिलकर दरियापुर में शराब की एक दुकान को बंद करवाया था। दरियापुर मोकामा और शेरपुर के बीच में एक गांव है, हथिदह के करीब।

हमारे गांव के लोग बाबूजी की इन्हीं गतिविधियों से डरते थे। उन्हें लगता था कि ये बात अंग्रेजों को अगर मालूम हो गया तो इसकी सजा पूरे गांव को मिलेगी। इस बात की शिकायत कुछ लोगों ने बड़का बाबू (बाबूजी के बड़े भाई) से भी की थी।

बाबूजी का अक्षर ज्ञान धार्मिक ग्रंथों से हुआ। लेकिन देश और दुनिया की जानकारी के लिए वो अखबार नियमित रूप से पढ़ते थे। वो बताते थे कि अंग्रेजों के आने के पहले हमारे देश में राजे-रजवाड़ों, नवाबों, जमींदारों पर आधारित व्यवस्था थी। अंग्रेजों ने उसमें कुछ खास परिवर्तन नहीं किया। बल्कि उसी व्यवस्था का उपयोग उन्होंने अपने हक़ में किया। उनके अपने देश में लोकतंत्र की शुरुआत हो चुकी थी। लेकिन हमारे यहां वो जनता को लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित रखते थे।

स्वतंत्रता आंदोलन अपने आप में एक पूरा पाठ्यक्रम था, हमारे समाज और देश के लिए। बाबूजी और अन्य लोग जो उस आन्दोलन से प्रभावित थे, उनके समझने और सीखने के लिए उसमें आजादी के अलावा और कई विषय थे जैसे समानता, सामाजिक परिवर्तन, समरसता, आर्थिक विकास इत्यादि। उस पाठ्यक्रम के शिक्षक थे गांधी, नेहरू, पटेल, अम्बेडकर, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सुभाषचन्द्र बोस, भगतसिंह जैसी महान विभूतियां। ऐसी बात नहीं है उन सभी विभूतियों के विचार एक ही थे। उनके मत अलग अलग भी थे। पर सभी का उद्देश्य एक था: हिन्दुस्तान को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराना एवं देश में जनतंत्र की स्थापना करना।

मोकामा पुल
मोकामा पुल का उद्घाटन 1959 में नेहरू जी ने किया था। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने इस पुल का शिलान्यास किया था। और उस समय के विख्यात इंजीनियर, एम विश्वेश्वरैया, की देखरेख में इसका निर्माण हुआ था। विश्वेश्वरैया की उम्र तब नब्बे से अधिक थी। इस पुल का बनना हमारे क्षेत्र और प्रदेश के लिए एक ऐतिहासिक घटना थी।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के शुरू के वर्षों में गंगा नदी पर बना ये दोमंजिला सेतु आधुनिक तकनीक का एक अनूठा उदाहरण था। ये उत्तर और दक्षिण बिहार को रेल और सड़क मार्ग दोनों से जोड़ता है। देश के उत्तर पूर्वी राज्यों से जोड़ने में भी सहायक सिद्ध हुआ। इसके बनने के पहले हमारे क्षेत्र में आवागमन का मुख्य केन्द्र था मोकामा घाट जहां से माल और यात्री को गंगा नदी के दूसरी ओर पानी के जहाज से पहुंचाया जाता था। मोकामा पुल के बनने के बाद मोकामा घाट बस एक इतिहास बन गया। उसका महत्व खत्म हो गया।

मेरे भाई, चन्द्रमौली, की शादी 1958 में हुई थी। तब पुल का निर्माण पूरा नहीं हुआ था। उसका ससुराल है रहीमपुर, गंगा के उस पार खगड़िया के पास। शादी के लिए शेरपुर से उसकी बारात मोकामा घाट होकर ही जहाज से गंगा के उस पार गई थी। बारात में लगभग एक सौ लोग होंगे।

उसकी शादी के बाद पहली बार होली का पर्व आया, 1959 के मार्च-अप्रैल के महीने में। तब चन्द्रमौली ससुराल गया था। हमारे यहां शादी के शुरू के वर्षों में होली के अवसर पर मेहमान को ससुराल में आमंत्रित करने की प्रथा है। हम दामाद और बहनोई दोनों को मेहमान शब्द से संबोधित करते हैं। मेहमान शब्द का ये खास प्रयोग हमारे इलाके में काफी प्रचलित है।

ससुराल जाने के समय चंद्रमौली मोकामा घाट होकर पानी के जहाज से गंगा पार किया था। ससुराल से एक महीने बाद वो लौटा रेल मार्ग से मोकामा पुल होकर। तब तक पुल का उद्घाटन हो चुका था। वो बताता है कि रात के समय हथिदह स्टेशन पर उतरा तो अचानक उसे समझ में नहीं आया कि वो कहां उतर गया है। क्योंकि एक महीने के अंदर वहां बहुत कुछ बदल चुका था।

15 मई को जिस दिन पुल का उद्घाटन हुआ बाबूजी काफी उत्साहित थे। पुल के निर्माण को लेकर और नेहरू के आने से। नेहरू उनके प्रिय नेता थे। मैया के साथ मुझे भी साथ ले गए थे समारोह को देखने के लिए। मेरा बड़ा लड़का, अरुण, उस समय मेरे गर्भ में सात महीने का था। आंठवा महीना शुरू हो गया था। आज भी जब उस घटना के बारे में सोचती हूं तो लगता है कि बाबूजी का वो कदम कितना साहसिक था। उस समय महिलाओं के ऊपर कितना प्रतिबंध था। उनके घर से निकलने से लेकर उनकी पढ़ाई, नौकरी हरेक चीज पर। इसके बावजूद वो हमें पैदल लेकर गये थे।

हमारे गांव से हथिदह करीब दो किलोमीटर है। रास्ते में एक मानव सैलाब था। हमारी तरह लोग पुल के उद्घाटन समारोह को देखने दस किलोमीटर, पन्द्रह किलोमीटर दूर गांवों से पैदल चलकर आ रहे थे। आजादी के बाद विकसित तकनीक के एक नायाब नमूने को देखने और अपने प्रिय प्रधानमंत्री नेहरू को सुनने।

पुल पर चढ़ने वाली गाड़ियों के लिए जो रेलवे लाइन बिछाई गई थी, वो जमीन से करीब तीस फीट ऊंची है। उसी ऊंचाई पर, पुल शुरू होने के ठीक पहले, हथिदह रेलवे स्टेशन है। स्टेशन से उत्तर-पूर्व की ओर नीचे खुला मैदान है। गंगा नदी के किनारे तक फैला हुआ। स्टेशन से नीचे आती हुई ढ़लान पर उद्घाटन मंच बनाया गया था, प्रधानमंत्री नेहरू, मुख्यमंत्री श्रीबाबू और अन्य गणमान्य अतिथियों के लिए। मंच लगभग दस फीट ऊंचा होगा। नेहरू जी और श्रीबाबू साथ साथ बैठे थे। नेहरू ने अपने भाषण में क्या कहा, मुझे याद नहीं है। पर इतना याद है कि श्रीबाबू जब बोलने के लिए उठने लगे तो उन्हें उठने में कठिनाई हो रही थी। नेहरू तुरत उनकी मदद के लिए उठ खड़े हुए। श्रीबाबू का शरीर थोड़ा भारी था। इस कहानी को सुनकर मेरा लड़का, अरुण, मजाक में कहता है कि फिर तो तुमने मुझे भी नेहरू जी के दर्शन करवा दिए।

उद्घाटन समारोह में शामिल होने के लिए मेरे पतिदेव भी आए थे अपने दोस्तों के साथ। उद्घाटन तिथि की घोषणा के बाद जब वो शेरपुर आए थे तभी हमने तय किया था कि हम दोनों समारोह स्थल पर मिलेंगे। वो आएंगे मोकामा से और हमलोग शेरपुर से। हथिदह मोकामा और शेरपुर दोनों के बीच में स्थित है। भीड़ में मैं तो उन्हें नहीं देख पाई। पर उन्होंने मुझे पहचान लिया मेरी लाल साड़ी को देखकर। वो मंच के पास थोड़ी ऊंचाई पर खड़े थे। समारोह के बाद हमसे मिलने आये थे। उद्घाटन समारोह का वो मंच आज भी इन सारी बातों के गवाह के रूप में वहां मौजूद है।

1967 में हमें मोकामा पुल पर बना एक बहुत ही मधुर गीत सुनने को मिला झारखंड के सुदूर जंगलों में। हमलोग तब मंझारी में थे। मंझारी झारखंड का एक ब्लाक है जो कि चाईबासा से काफी आगे है। उड़ीसा की सीमा से सटा हुआ। पतिदेव ब्लाक में ही कार्यरत थे। हमलोग ब्लाक के क्वार्टर में रहते थे। तब-तक हमारे परिवार में अरुण के अलावा सीमा और शीला भी शामिल हो गयी थी। जब आप अपने गांव, घर से काफी दूर रह रहे हों और वहां कोई ऐसा गीत सुनने को मिले जिसमें आपके गांव का जिक्र हो तो सुनकर अच्छा लगता है। ये हमारे घर का गृहगान बन गया:

जब से हिमालय बाटे
भारत देसवा में
ताहि बीच हहरे गंगा धार
हैरे मोकामा, पुलवा लागेला सुहावन

ऐलै पंचवर्षीय योजनमां
पुलवा के नीव जे परलै
बांधि देलकै गंगा धार
हैरे मोकामा, पुलवा लागेला सुहावन

उतरा के चावल धनमां
दक्खिना के कोयला पानी
ताहि बीच हहरै गंगा धार
हैरे मोकामा, पुलवा लागेला सुहावन

ऊपर ऊपर मोटर गाड़ी
तेकर नीचे रेलगाड़ी
तेकर नीचे छक-छक पनिया जहाज
हैरे मोकामा पुलवा लागेला सुहावन

https://www.youtube.com/watch?v=khvSKBi0vOU

©अरुण जी

फोटो: मोकामा पुल,
Source: Wikimedia comm

मैया की कहानी, मैया की जुबानी 7

उषा की मृत्यु मेरे जीवन की सबसे दुखद घटना थी। उस दिन मुझे इतना याद है कि मैं जार-बजार रोये जा रही थी और सरकार जी(सास), मेरी गोतनी (जेठानी) सभी मुझे ढाढस बंधाने की कोशिश कर रहीं थीं। मैं बार-बार रोती थी और अपने आप को कोसती थी कि मेरे साथ क्यों ऐसा क्यों हो रहा है? भगवान मुझे किस गलती की सजा दे रहे हैं? दो साल के अंतराल में एक के बाद एक लगातार दो संतानों की मौत। मेरे लिए जीवन जैसे ठहर गया था। खबर मिलते ही बाबूजी आये और मुझे शेरपुर लेकर चले गए।

बाद में पतिदेव ने बताया कि ससुराल परिवार में भी मातम का माहौल था। हमारे ससुराल की एक खास बात है कि परिवार में चाहे कितना भी बड़ा दुख पड़ जाए, मर्द लोगों की आंखों से आंसू नहीं निकलते हैं। अपने पति की आंखों में मैंने कभी भी आंसू नहीं देखा है। पर उनके एक बड़े भाई, जिन्हें बच्चे गोरू बाबू (उनका रंग गोरा था) के नाम से पुकारते थे, खूब रोये थे। उषा की मृत्यु से सभी दुखी थे। आज भी लोग उसे अफसोस के साथ याद करते हैं।

शेरपुर पहुंचने के बाद धीरे-धीरे मेरा रोना बन्द होने लगा पर मैं एकदम चुप चुप रहने लगी। किसी काम में मन नहीं लगता था। कई दिनों तक मैंने नहाया भी नहीं। बार-बार मन में यही आता कि आखिर ये मेरे साथ ही क्यों हुआ? मेरी क्या गलती है? मेरी हालत को देखकर मां और बाबूजी चिन्तित रहने लगे।

दोनों बच्चों का गुजरना मेरे ऊपर एक बड़ा भावनात्मक, मानसिक आघात था। मेरे लिए वो व्यक्तिगत तो था ही पर सामाजिक भी था। उन दिनों भारत में शिशु मृत्यु दर वैसे भी काफी ज्यादा था। जैसा कि पहले भी मैंने बताया कि चार में से एक शिशु की मौत हो जाती थी। और उसका मूल कारण था स्वास्थ्य सेवाओं में कमी। पर इसका खामियाजा भुगतना पड़ता था औरतों को।

जिन औरतौं के शिशु मरते थे उन्हें हमारे यहां मरौंछ कहा करते थे। और घर में उन्हें शादी, छट्ठी (शिशु के जन्म के बाद का छठा दिन) जैसे शुभ कार्यक्रमों से दूर रखा जाता था। इस परिपाटी का महत्व मुझे आज तक समझ में नहीं आया। ऐसी परिस्थिति में एक तो औरत खुद पीड़ा में होती है। पर वो अगर उस पीड़ा को भूलने की कोशिश भी करे तो समाज उसे भूलने नहीं देता था। पुरुष इस सामाजिक तिरस्कार से बिल्कुल अछूता रहता था। शायद यही कारण है कि मेरे दिल में आज भी उन बातों की टीस मौजूद है।

हमारे गांव में उन दिनों एक संन्यासी आते थे। मेरे बाबूजी के हमउम्र और दोस्त थे। उनका नाम था हरिनंदन शर्मा। नवादा जिले के लाल विघा नामक गांव के रहने वाले थे। संस्कृत और हिन्दी के विद्वान थे। उन्होंने स्वतन्त्रता संग्राम में भी भाग लिया था। आध्यात्म की ओर झुकाव बढ़ने के कारण गृहस्थ जीवन को छोड़ वो संन्यासी बन गए थे।

हमारे गांव शेरपुर में ही उन्होंने गंगा किनारे 1947 में अपने गुरु से औपचारिक दीक्षा ली, संन्यासी का वस्त्र और नाम धारण किया था।और यही वजह है कि शेरपुर को वो अपनी जन्मस्थली मानने लगे। संन्यासी बनने के बाद वो स्वामी विज्ञानानंद के नाम से जाने जाने लगे। गांव के लोग उन्हें जोगी जी कहकर पुकारते थे।

जोगी जी गांव गांव में घूमकर गीता और रामायण पर प्रवचन दिया करते थे। उनकी विद्वता का Gita press, Gorakhpur वाले Hanuman Prasad Poddar, जसदयाल गोयनका, एवं संतश्री रामसुखदास जी भी सम्मान करते थे। यही वजह है कि जोगी जी को गीता भवन ऋषिकेश में प्रत्येक वर्ष गीता पर प्रवचन देने के लिए आमंत्रित किया जाता था।

शेरपुर से उन्हें खास लगाव था। प्रत्येक वर्ष वो अपने सहयोगी स्वामी आनंदानन्द के साथ शेरपुर आकर एक महीना गंगा सेवन करते थे। गंगा किनारे, आम के बगीचों के बीच मंदिर के समीप बनी एक कुटिया में उनका निवास होता था। रोज शाम को उनका एक घंटे का कार्यक्रम होता था जिसमें गीता, रामायण से जुड़ी कहानियां, दृष्टांत या विवरण होता था। प्रवचन का समापन वो एक भजन से करते थे जिसकी पहली पंक्ति कुछ इस प्रकार है:

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव।

उनकी इस पंक्ति को उन्हीं के अंदाज में गाने की कोशिश मेरा लड़का आज भी करता है। जब वह छोटा था तो उसे मैं प्रवचन सुनने साथ में ले जाती थी। वो बताता है कि वो हमेशा प्रवचन के अन्त में जोगी जी के गायन का इंतजार करता था और फिर उसके बाद प्रसाद के रूप में मिश्री का।

उषा के गुजरने के बाद अवसाद की अवस्था में जब मैं शेरपुर में रह रही थी, उन्हीं दिनों जोगी जी वहां आये हुए थे। बाबूजी मुझे उनसे मिलाने ले गए। उन्होंने गौर से मेरी बातों को सुना। फिर समझाया कि सुख और दुःख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दुख के बाद सुख और सुख के बाद दुख का आना निश्चित है। इसलिए हमें न तो दुख में कभी घबराना, न ही सुख में कभी इतराना चाहिए। जोगी जी की बातों को सुनकर मुझे थोड़ी राहत मिली।

इसके बाद रोज शाम को मैं उनका प्रवचन सुनने जाने लगी। उनके हरेक प्रवचन में कोई न कोई नया श्लोक, नया संदेश होता था। और मैं घर आकर धार्मिक ग्रंथों जैसे गीता, रामायण में उन्हें खोजती और फिर उनका अर्थ लिखती थी। धीरे धीरे मेरे अंदर नयी चीजों को जानने, सीखने की इच्छा होने लगी और मैं खुश रहने लगी।

इस बीच पतिदेव की नौकरी लग गई, राज्य सरकार के सहकारिता विभाग में। उसी साल(1958) मेरे भाई, चन्द्रमौली, की शादी भी हुई। शादी में शामिल होने के लिए मेरे पति रांची से आए थे। रांची में उस समय उनकी ट्रेनिंग चल रही थी।

©arunjee

Photo: तारा देवी एवं राम बहादुर सिंह,
2 June 1986

मैया की कहानी, मैया की जुबानी 6

1950-60 के आसपास भारत में शिशु मृत्यु दर काफी ज्यादा था। एक साल से कम उम्र के शिशुओं की मृत्यु सबसे ज्यादा होती थी। हमारे पड़ोस में शायद ही कोई ऐसा घर होगा जिसमें किसी एक महिला के बच्चे की मृत्यु न हुई हो। हाल में मैं अपनी बड़ी दीदी के लड़के, बिनोद, से बात कर रही थी तो उसने बताया कि 1960 में शिशु मृत्यु दर लगभग 25 प्रतिशत था। मतलब 100 में 25 बच्चे मर जाते थे। बिनोद डाक्टर है और आजकल बड़हिया के सरकारी अस्पताल का इंचार्ज। स्वास्थ्य सेवाओं की उसे अच्छी जानकारी है।

एक गर्भवती महिला को खान-पान, रहन-सहन पर काफी ध्यान देना चाहिए। पोषक तत्वों का भी ध्यान रखना होता है। अपने मायके, शेरपुर, आने के बाद मैंने अपने खाने-पीने पर उतना ध्यान नहीं दिया। शरीर की जरूरत की बजाय मैं स्वाद के अनुसार आहार लेना ज्यादा पसंद करने लगी। थोड़ी कमजोर तो मैं पहले से थी, ऊपर से गर्भावस्था और पोषक तत्वों की कमी ने हालत और नाजुक कर दी। गांव में प्रसव के पहले जांच करवाने की उतनी सुविधा नहीं थी, न ही जागरूकता।

नौवें महीने में जब मुझे असहनीय प्रसव पीड़ा शुरू हुई तो बाबूजी ने पालकी बुलवाकर मां के साथ मुझे मोकामा के पादरी अस्पताल भेजा। उस पूरे इलाके में वही एकमात्र ऐसा अस्पताल था जहां लोग 50 मील दूर से अपना इलाज करवाने आते थे: बड़हिया, बेगुसराय, लक्खीसराय, बरबीघा जैसे शहर और उनके आसपास के गांवों से। 1948 में एक छोटे पैमाने पर पादरियों के द्वारा खोला गया ये अस्पताल धीरे धीरे लोकप्रिय हो रहा था। नाम तो इसका था नाज़रेथ अस्पताल पर लोगों में ये पादरी अस्पताल के रूप में जाना जाता था।

शेरपुर से मोकामा की दूरी 12 किलोमीटर है। उस लंबी दूरी को प्रसव की असहनीय पीड़ा के साथ पालकी से मैंने कैसे तय किया, ये मेरा ईश्वर जानता है। उस समय मुझपर जो बीती, आज सोचती हूं तो सिहरन होने लगती है। दूसरा कोई साधन भी नहीं था। खैर, किसी तरह मैं अस्पताल तो पहुंच गई। पर मेरा पहला बच्चा, लड़का, पैदा होने के चार दिन बाद गुजर गया।

मेरे लिए ये एक बड़ा झटका था। नौ महीने तक शिशु को अपने गर्भ में पालना, फिर असहनीय पीड़ा के बाद उसे खो देना। बहुत ही कष्टदायक था। और ये शारीरिक कष्ट से अधिक मानसिक और भावनात्मक था।

सिजेरियन ऑपरेशन को उस समय लोग ‘बड़ी आपरेशन’ कहते थे। लेकिन मेरे प्रसव के बाद डाक्टर ने जो आपरेशन किया था, उसका नाम था ‘छोटी आपरेशन’। चिकित्सा के तकनीक का उतना विकास नहीं हुआ था। कहने को ‘छोटी आपरेशन’ था, पर अस्पताल में मुझे नौ दिन तक रहना पड़ा था।

मोकामा ससुराल होने के कारण रोज कोई न कोई मुझसे मिलने आते थे: सरकार जी(सास), ननद, जेठानी, देवर वगैरह। किन्तु उस कठिन समय में सबसे बड़े सम्बल थे मेरे पति। वे रोज शाम को आते अपने दोस्तों को लेकर। पूरी शाम मेरे पास बैठकर अपने अंदाज में हंसी ठहाके के साथ दिल बहलाया करते थे। ऐसा लगता था मानो उन पर इस बात कोई असर ही नहीं है। उनको देखकर अच्छा लगता था। जितनी देर वो साथ बैठते मैं अपना दुख भूल जाती थी।

अस्पताल से छुट्टी मिलने पर मैं शेरपुर चली गई। पति का साथ और बाबूजी, मां के स्नेह के सहारे धीरे धीरे उस दुख को भूलने लगी।

बाबूजी हम तीनों बहनों को बहुत प्यार करते थे। वे हमें ससुराल के लिए तभी विदा करना चाहते थे जब हमारे पतियों की पढ़ाई समाप्त होने के बाद नौकरी लग जाय। बड़ी दीदी को उन्होंने नौ साल शेरपुर में रखा। बड़का मेहमान(बड़की दी के पति) की नौकरी लगने के बाद ही उसका ससुराल में नियमित रूप से रहना शुरू हुआ। मंझली दीदी भी हमारे यहां लगातार बारह साल रही। इस बीच उसके बच्चों का जन्म से लेकर पालन-पोषण सब यहीं हुआ। पर मेरे मामले में ये पूरी तरह से सम्भव नहीं हो पाया।

मेरे पति उस समय मुंगेर के आर डी ऐंड डी जे कालेज में बीए के विद्यार्थी थे। कालेज से जब कभी भी छुट्टी मिलती, वो शेरपुर चले आते थे। एकबार शेरपुर में उन्हें रहने में कुछ दिक्कत हुई तो वे मुझे ससुराल (मोकामा) लेकर चले गए। बाबूजी और मां ने मना करने की कोशिश भी की पर वो एक नहीं माने।

ससुराल पहुंचने पर हाल ये था कि हमारे ससुर के तीनों भाइयों के परिवार को मिलाकर लगभग 50 लोग थे। सभी का खाना एक ही चूल्हे पर, एक साथ बनता था। हम सभी औरतें मिल कर बनाते थे। इसके अलावा भी दिन भर कुछ न कुछ काम होता ही था। करते करते मैं थक जाती थी। इसी बीच मैं फिर गर्भवती हो गई। कमजोरी इतनी हुई कि दस दिन के लिए मुझे नाज़रेथ अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। इसके बाद ससुराल में लोग मेरे स्वास्थ्य के प्रति सचेत हुए।

1956 में मुझे दूसरी संतान की प्राप्ति हुई। इस बार लड़की हुई, जिसे पाकर मैं फूले नहीं समाई। उसका नाम हमने उषा रखा। मेरे जीवन में वो उषा की किरण की तरह आई। सुन्दर और सुडौल। जल्द ही उषा परिवार की लाडली बन गई। पतिदेव के भाई लोग उसे गोद में उठाए रहते थे। जब कभी भी मैं उसे बंगला(दालान) पर भिजवाती तो मेरे भैंसुर लोग गर्व से गोद में लेकर उसे घूमते थे। आज मेरे चार बच्चे हैं। पर अभी भी लोग कहते हैं कि उषा के इतनी सुन्दर कोई नहीं है, बिल्कुल अपने पिता पर गई थी।

उषा के आने के बाद पहले संतान को खोने का ग़म मैं एकदम भूल गयी। मेरे जीवन की वो धूरी बन गई। उसी के चारो ओर मेरा जीवन घूमने लगा। आठ महीने कैसे गुजर गए, पता ही नहीं चला।

देखते देखते नागपंचमी आ गया। वर्षा ऋतु का ये पर्व सावन के पांचवें दिन हमारे क्षेत्र में काफी धूमधाम से मनाया जाता है। नाग देवता की पूजा होती है। बरसात के दिनों में सांपों का प्रकोप गांव देहात में बढ़ जाता है। शायद इसीलिए इस त्योहार को मनाने और उसमें नीम की पत्तियों के प्रयोग की प्रथा शुरू हुई होगी।

सुबह से घर में त्योहार की धूम थी। सभी लोग व्यस्त थे। दिन की शुरुआत हुई नीम की पांच पत्तियों के साथ दही खाने से। कुछ लोग हरेक कमरे के आगे नीम की एक एक टहनी को लगा रहे थे। नाग की पूजा के लिए दूध और धान का लावा परोसा जा रहा था। खाने के व्यंजन जैसे फुटपुर(दलपूरी), तसमय(खीर) इत्यादि बन रहे थे और लोग खा रहे थे। फलों में आम और कटहल का कोवा।

इधर मेरी बेटी उषा को सुबह से ही दस्त होने लगा। मुझे बच्चों की बीमारी के बारे में न कोई जानकारी थी, ना ही कोई अनुभव। मैंने तुरंत ही सरकार जी को इसकी सूचना दी। पतिदेव घर में थे पर इस बारे में वो कोई फैसला नहीं ले सकते थे। वैसे भी वो एक विद्यार्थी थे। अभी नौकरी नहीं लगी थी। खुद भी अपनी पढ़ाई के लिए मालिक के ऊपर निर्भर थे। नियम ये था कि घर का कोई भी सदस्य अगर बीमार पड़े तो उसके इलाज की जिम्मेवारी मालिक की होती थी। मालिक मतलब परिवार का मुखिया। प्रायः ऐसा होता था कि मालिक सबसे पहले वैद्य जी को बुलवाते थे। वैद्य जी की दवा का अगर असर नहीं हुआ, फिर उसे एलोपैथिक डाक्टर के पास या अस्पताल भेजा जाता था।

उषा के मामले भी यही हुआ। वैद्य जी ने दवा दी, कोई असर नहीं हुआ। दोपहर तक शरीर में पानी की कमी होने के कारण उसकी हालत बिगड़ने लगी। जब मैं रोने पीटने लगी तो फिर जल्दी से उसे अस्पताल ले जाने की व्यवस्था की गई। पर तब तक देर हो चुकी थी। अस्पताल के रास्ते में ही मेरी प्यारी बेटी उषा चल बसी।

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Photo: Tara Devi, 31 October 2016
Photo credit: Arun Jee

मैया की कहानी, मैया की जुबानी 4

शेरपुर में हमारा घर मिट्टी का था, उपर खपरैल। हमारे गांव में उस समय शायद सारे घर कच्ची दीवारों के ही थे। एक बार हमारे पड़ोस में चोरी हुई थी। चोर रात में घर के पीछे वाली दीवार में सेंध मारकर अंदर दाखिल हो गया। कच्ची दीवारों में सेंध मारना आसान होता है। सुबह उठकर लोगों ने देखा कि उनके घर के सारे पेटी बक्से, जिनमें कीमती कपड़े एवं जेवर थे, गायब थे।

इस तरह की चोरियां हमारे यहां आए दिन होती थीं। हमारे घर में भी एक दो बार हुई थी। एक बार तो मेरे भाई, चंद्रमौली, ने रात में ही चोर को पकड़ लिया था। वो भी एक अलग कहानी है। बहरहाल मिट्टी के हमारे घर उतने सुरक्षित नहीं थे।

मेरी शादी की तैयारी के सिलसिले में बाबूजी कई बार मोकामा मेरे ससुराल जाया करते थे। वहां से लौटने के बाद मां को बहुत सारी बातें बताया करते थे: घर-बार, लडका, उसके परिवार इत्यादि के बारे में। उस बातचीत में मैं शामिल नहीं होती थी, पर उन बातों को मैं छुप-छुप कर सुना करती थी। वो बताते थे कि पक्का का बहुत बड़ा मकान है। सुनकर काफी गर्व महसूस होता था।

मोकामा का घर गांव के पारंपरिक वास्तुकला का एक नमूना था। रोड के सामने ऊंची दीवार थी जिसके बीचो-बीच उपर चढ़ने के लिए कई सीढ़ियां। सीढ़ियों पे चढ़कर आपको एक मैदान मिलेगा, इतना बड़ा कि उसपर बच्चे गुल्ली-डंडा खेलते थे। मैदान के दांई ओर एक बड़ा चबूतरा और फिर सामने और बाईं ओर एल के आकार का खपरैल का दालान था जिसे हम बंगला भी कहते थे। सामने वाले दालान पर चढ़ने के लिए चार पांच और सीढ़ियां। फिर ठीक उसके बीचो-बीच एक विशाल दरवाजा था जिससे होकर हम घर के अंदर दाखिल होते थे। घर आयताकार था जिसके चारो ओर ग्यारह कमरे बने थे और बीच में आंगन था। घर से बाहर, पर उससे बिल्कुल सटा हुआ रसोईघर था और उसी के निकट औरतों के लिए शौचालय। छत पर जाने की सीढ़ियां अंदर ही थीं। एक कुआं भी था।

जीवन के इस नए मोड़ पर कच्चे घर से पक्के घर में मेरा प्रवेश हुआ। पर इसके अलावा और भी कई बदलाव हुए जो कम महत्वपूर्ण नहीं थे। दुल्हन के रुप में जब मैं उतरी तो पूर्ण रूप से घूंघट से ढ़की हुई। कहने को मुझे एक अलग कमरा मिला था पर शुरू के कुछ दिनों में ज्यादा समय अपने दोनों पांवों को मोड़कर, चुक्कू-मुक्कू, बैठी रहती थी। घर की औरतें, लड़कियां दिन भर मुझे घेरे रहती थीं।

नई-नवेली दुल्हन के आने पर एक रस्म होता था जिसका नाम था मुंहदिखाई। रस्म तो आज भी है लेकिन नियमों में काफी बदलाव आ गया है। मुंहदिखाई के लिए घर के या फिर पास-पड़ोस के पुरुष एवं औरत जब आते थे तो उन्हें दुल्हन का चेहरा घूंघट हटा कर दिखाया जाता था। दुल्हन की आंखें एकदम बंद होती थी और चेहरा भावहीन। अगर गलती से भी किसी की आंखें खुल गईं तो लोग शिकायत करते थे। मुंह देखने के बाद हरेक व्यक्ति कुछ पैसा दुल्हन को देता था। कुल मिलाकर उस समय मुझे 15 रुपये मिले होंगे। देखने के बाद लोग अपना-अपना मत भी प्रकट करते थे कि लड़की कैसी है या जोड़ी कैसी है।

मेरी एक ही ननद हैं, उम्र में मुझसे छोटी। उनका नाम है मालती। उन्होंने कई सालों बाद मुझे बताया कि उनकी एक सखी ने जब हमारी जोड़ी के बारे में कहा कि “राम नैया डगमग, सीता मैया चौगुना”, तो उसको उन्होंने खूब बुरा भला कहा था। असल में मेरे पति उस समय एकदम दुबले-पतले थे। उनके अनुपात में मेरा वजन थोड़ा ज्यादा था।

शादी के बाद मैं तीन महीने ससुराल में रही और मेरी पहचान ही बदल गई। मेरा नाम तारा था पर मुझे लोग दुल्हन के नाम से पुकारते थे और तब तक पुकारते रहे जब-तक दूसरी दुल्हन घर में नहीं आ गई। मैं व्यक्ति वाचक से जाति वाचक संज्ञा बन गई थी। बाद में मैं अपने गांव के नाम से जानी जाती थी। मैं तारा नहीं, शेरपुर वाली बन गई। ज़िन्दगी का पूरा व्याकरण बदल गया था।

नैहर में मैं एक चुलबुली लड़की थी, रोज गंगा नहाने जाती थी। लेकिन ससुराल में अपने घूंघट में सिमटकर रह गई थी। कमरे से मुझे केवल शौच के लिए बाहर निकाला जाता था, वो भी पूरी तरह से ढ़ककर। नहीं तो खाना-पीना, नहाना उसी कमरे में होता था। नैहर के हमारे परिवार में इतनी सख्ती नहीं थी। ससुराल में हंसना भी मना था।

एक जेठानी और एक चचेरी ननद दोनों मेरी हमउम्र थीं। एक का नाम था स्वर्णलता और दूसरी थी गोदावरी। उन दोनों की शादियां हो गई थी। इसलिए जब कभी भी मौका मिलता था तो हम एक दूसरे से अपनी अपनी शादी के अनुभवों को साझा करते थे और हंसते भी थे। एक बार ऐसा हुआ कि जब हमारी हंसी की आवाज बाहर चली गई तो बाहर से एक बुजुर्ग महिला आईं और कहने लगीं कि दुल्हन को इतनी जोर से नहीं हंसना चाहिए।

©arunjee

#Mokama #Sherpur_Hathidah #Magahi #Dulhan #Womenaftermarrige

Photo 1: Tara Devi, 2015
Photo 2: Her in-law’s house, 2006
Photo credit: Arun Jee

मैया की कहानी, मैया की जुबानी 3

1950 में मैं सोलह साल की थी जब मेरी शादी हुई। आज के सन्दर्भ में शादी के लिए मेरी उम्र को कम कहा जा सकता है, गैरकानूनी भी। पर उस समय अगर लड़की सोलह साल की हो गई तो पिता को उसकी शादी की चिंता सताने लगती थी। ज्यादातर लड़कियों की शादी सोलह से कम में ही कर दी जाती थी।

पहली कड़ी में मैंने बताया था कि किस तरह मोकामा सकरवार टोला की एक बारात को हमारे गांव के लोगों ने पत्थर मारकर भगा दिया था। आठ साल बाद उसी नगर के उसी मुहल्ले में मेरी शादी ठीक हुई। मोकामा एक कस्बा है जिसे आप एक नगर भी कह सकते हैं। ये हमारे गांव के उत्तर पश्चिम में गंगा नदी के किनारे बसा है।

हमारे जमाने में शादी के मामले में लड़के लड़कियों से कोई राय-मशविरा नहीं लिया जाता था। फोटो आदान-प्रदान करने का भी कोई रिवाज नहीं था। वैसे भी फोटोग्राफी तब सामान्य लोगों में प्रचलित नहीं हुआ था। लड़की के पिता गांव गांव घूमकर कोई उपयुक्त रिश्ता ढूंढकर लड़की की शादी तय करते थे। शादी ठीक करते समय लड़के के अलावा जमीन-जायदाद, कुल-खानदान वगैरह देखा जाता था। मेरे बाबूजी ने अपने तीनों बेटियों की शादी के लिए इन सारी बातों के अलावा कई और सुविधाएं जैसे यातायात, अस्पताल, बाजार इत्यादि का भी ध्यान रखा था।

इसीलिए मेरी और मेरी बड़ी दीदी, सत्यभामा, की शादी मोकामा में हुई। और मंझली दीदी, जयमंती, की इन्दुपुर में, जो कि बड़हिया के बिल्कुल करीब है। बड़हिया भी मोकामा की तरह ही एक कस्बा है, शेरपुर के दक्खिन में गंगा के तट पर। हमारे यहां लोगों को गंगा नदी से काफी लगाव है। वो अपनी लड़कियों की शादी के लिए गंगा के किनारे बसे गांव या शहर को ज्यादा महत्व देते थे।

शादी के समय मेरे पति की उम्र 19 साल थी। वो पांच भाइयों में तीसरे नंबर पर थे। मैट्रिक के विद्यार्थी थे। एकदम गोरे चिट्टे, तीखे नैन-नक्श। गोरा रंग और लम्बी, पतली नाक सुन्दरता के महत्वपूर्ण मापदंड थे, आज भी हैं। क्यों हैं ये पता नहीं।

बारात जब हमारे दरवाजे पर लगी तो मेरी सहेलियों ने उन्हें देखा और घर में आकर मुझे चिढ़ाने लगे कि लड़का तो एकदम अंग्रेज लगता है। उसी समय मेरे कानों में वो गीत गूंजने लगा:

रामचन्द्र दुल्हा सुहावन लागे,
अति मन भावन लागे हे,
माइ हे न जाने ब्रम्हा जी के हाथे गुन
कौशल्या जी के कोखे गुन हे।

आज भी उन्हें पहली बार देखने पर कुछ लोग उन्हें यूरोपियन समझ लेते हैं। ससुराल आने पर मुझे बताया गया कि जब वो पैदा हुए थे तो इतने सुन्दर दिखते थे अचानक किसी के मुंह से निकल गया कि ये तो सुग्गा(तोता) जैसा सुन्दर है। फिर वही उनका पुकारु नाम पड़ गया। वैसे तो उनका नाम राम बहादुर सिंह था पर बड़े लोग उन्हें सुगना और छोटे सुगो दा(दादा) या सुगो चा(चाचा) कहकर पुकारते थे।

उस सुन्दरता का एक मूल्य भी था। दहेज के रूप में बाबूजी को 6 हजार रुपया देना था। बाकी भाइयों की अपेक्षा मेरे पति के लिए दहेज की रकम थोड़ी बढ़ा दी गई थी। दहेज प्रथा के बारे में सुनकर आज की नई पीढ़ी को शायद थोड़ा धक्का लगे। पर उस समय वो काफी प्रचलित थी। वैसे किसी न किसी रूप में आज भी है। पर शायद कुछ कम हुआ है, खासकर लड़कियां जब से शिक्षित होने लगी हैं। हमारे समय में ये गैरकानूनी भी नहीं था। अरुण ने गूगल पर खोजकर मुझे बताया कि 1961 में इसे गैरकानूनी घोषित किया गया।

बाबूजी एक किसान थे। हमारे गांव में किसानों की हालत बहुत खराब थी। जमीन का एक बड़ा भाग गंगा जी के पेट में चला गया था। अपने घर की स्थिति को मैं भलिभाति जानती थी। बाबूजी दहेज देने की स्थिति में नहीं थे।

उन्होंने अपने होने वाले समधी, मेरे होने वाले ससुर, से अनुरोध किया कि दहेज की आधी रकम, तीन हजार, वो शादी में देंगे और बाकी की रकम दुरागमन के वक्त। उस समय शादियां कम उम्र में होती थीं। इसलिए शादी के प्रायः दो तीन साल बाद लड़की का दुरागमन होता था। दुरागमन मतलब लड़की का दूसरी बार ससुराल गमन। कुछ लोग इसे दूसरी शादी भी कहते थे। मेरे ससुर इस बात पर मान गए।

शादी के बाद मैं और मेरे पति एक ही पालकी में सवार होकर शेरपुर से मोकामा के लिए विदा हुए। मेरे नैहर से ससुराल की दूरी 12 किलोमीटर है। कहार पालकी ढ़ो रहे थे और बंद पालकी में मैं अपने पति के सामने पूरी तरह घूंघट ओढ़कर बैठी थी। मेरे मन में मिश्रित भावनाएं थीं: घर से विदाई का ग़म, ससुराल के बारे में आशंकाएं, पति से मधुर मिलन की दबी इच्छाएं वगैरह वगैरह। उन यादों को जब कुरेदती हूं तो मदर इंडिया का वो गाना याद आने लगता है:

पी के घर आज प्यारी दुल्हनियां चली
रोये माता पिता उनकी दुनियां चली।

#Bihar #Mokama #Magahigeet #Maiyakikahani

मैया की कहानी, मैया की जुबानी 2

हमलोग चार भाई बहन थे— तीन बहन और एक भाई। तीनो बहनों में मैं सबसे छोटी थी और भाई हम सबसे छोटा। वह मुझसे आठ वर्ष छोटा है। उसके जन्म होने के पहले मैं घर में सबसे छोटी थी, सबकी लाड़ली भी। उस ज़माने में बेटे और बेटियों में बहुत भेद-भाव किया जाता था। वैसे तो यह फ़र्क आज भी किसी न किसी रूप में बरक़रार है। पर मेरे बाबू जी के विचार बिल्कुल अलग थे। वे अपनी बेटियों को पढ़ाना चाहते थे। पहली दो बेटियों में तो वे सफ़ल नहीं हो सके, लेकिन मुझे वे पर्याप्त शिक्षा प्रदान करना चाहते थे। शुरू के वर्षों में घर में बेटा नहीं होने के कारण मेरा लालन-पालन भी बेटे के जैसा ही हुआ।

मेरा पहला स्कूल मेरे गांव का भी इकलौता स्कूल था । उसका नाम था ‘लाला गुरू जी का स्कूल’। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है इस स्कूल के शिक्षक, कर्ता-धर्ता और सबकुछ एक ही व्यक्ति थे, लाला गुरु जी। गुरु जी गांव के बच्चों को वर्णमाला एवं पहाड़ा की शिक्षा देते थे गांव के लोग इसके बदले उन्हें जो दक्षिणा देते थे, उसी से उनका जीवन यापन होता था। एक गुरु के द्वारा चलने वाले वाले ऐसे स्कूल आसपास के गावों में काफी प्रचलित थे। स्थानीय भाषा में इसे ‘पिंडा’ भी कहा जाता था। यहाँ मैंने हिंदी वर्णमाला, गणित में पहाड़ा एवं आसान जोड़ घटाव का ज्ञान हासिल किया। आजकल स्कूलों में 1 से 12 तक ही पहाड़ा सिखाया जाता है, लेकिन लाला गुरु जी के स्कूल में हमने 1 से 30 तक का पहाड़ा से लेकर सवैया(1.25), अढ़ैया(2.5), हुठा(3.5) इत्यादि दशमलव वाले पहाड़ों को भी मैंने कंठस्त कर लिया था।

करीब पच्चीस बरसों बाद मेरे बड़े लड़के, अरुण, की प्रारंभिक शिक्षा भी इसी स्कूल से शुरू हुई। उस समय गांव में एक पर्व मनाया जाता था जिसका नाम था चकचंदा। इस पर्व के अवसर पर गुरू जी अपने शिष्यों के साथ घर-घर जाते थे और गीत गा-गा कर गुरु दक्षिणा मांगते थे। मुझे याद है कि अरुण भी गुरु जी एवं अन्य शिष्यों के साथ एक बार हमारे घर आया था।बच्चों ने उसके आँख को बंद कर दिया और वे गाने लगे:

“बबुआ रे बबुआ, लाल-लाल ढबुआ
अंखिया लाल-पियर होळौ रे बबुआ,
मैया तोर कठोरा रे बबुआ
बाबू तोर निरमोहिया रे बबुआ
जरियो नै दर्द आवहौ रे बबुआ,
भूख लगल हौ रे बबुआ
प्यास लागल हौ रे बबुआ।

हमारे घर से गुरु जी के लिए दक्षिणा लेकर वे सभी दुसरे घर चले गए।

लाला गुरु जी के यहाँ मैंने कक्षा एक एवं दो की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद की पढ़ाई के लिए हमारे गांव में कोई विकल्प नहीं था। इसलिए बाबूजी ने मेरा दाखिला पास के गांव, बादपुर, के सरकारी स्कूल में करवा दिया। वह स्कूल मेरे घर से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर था।

नया स्कूल, नया बस्ता, नयी पुस्तकों को पाकर मैं काफी उत्साहित थी। घर से बाहर जाना, बल्कि गांव से भी दूर स्कूल में जाकर नयी चीजों के बारे में जानना और सीखना — मेरी कल्पना से बिल्कुल परे था। पहले दिन का अनुभव तो एकदम आशा के अनुरूप था — मैं स्कूल गयी और घर लौट कर आई, पूरे उत्साह और उमंग के साथ।

लेकिन दुसरे दिन मैं जैसे ही घर से बाहर निकली कि मेरे एक चचेरे भाई, जो मुझसे करीब २० साल बड़े होंगे, ने मुझे रोककर मेरा बस्ता छीन लिया और गुस्से में आकर कहा, “खबरदार! आज से तुम्हारा स्कूल जाना बंद। इसके बाद अगर मैंने तुम्हें स्कूल जाते हुए देखा, तो तुम्हारे हाथ पैर तोड़ दूंगा।”

बाद में उन्होंने मेरे बाबूजी को भी इसके लिए बुरा भला कहा। असल में हमारे इस भाई साहब ने हमारे संयुक्त परिवार के प्रतिष्ठा की सुरक्षा का बीड़ा उठा रखा था। इसलिए खासकर औरतों और बेटियों को बाहर भेजने पर उन्होंने पाबन्दी लगा रखी थी। अपने इस दायित्व को वह धर्म के रूप में निभाते थे।

पर बाबूजी ने हार नहीं मानी। अखबार इत्यादि के माध्यम से उन्होंने घर में ही मुझे पढ़ना और लिखना सिखलाया। थोड़ी बड़ी होने के बाद चिट्ठी पढ़ने और लिखने में मुझे दिक्कत नहीं होती थी। गांव में किसी के घर डाक से चिठ्ठी आती तो कई बार लोग मुझे बुलाने आते थे। मैं उनको चिठियां पढ़कर सुनाया करती थी।

अखबार के अलावा धीरे-धीरे मैं धार्मिक पुस्तकें भी पढ़ने लगी। उस समय रामायण, गीता, महाभारत जैसी पुस्तकें लोग घर-घर में पढ़ा करते थे। मेरे गांव में कई ऐसे व्यक्ति थे जिन्हे धार्मिक पुस्तकों की पंक्तियाँ पूरी तरह से याद थी। इन पुस्तकों का पाठ एवं गायन हमारे सामाजिक जीवन का एक अभिन्न अंग था।

मैं 13 या 14 वर्ष की हो गई होंगी जब मुझे और मेरी चचेरी बहन, कलावती, को बड़का बाबू शाम को बंगला(दालान) पर बुलाते थे और रामचरितमानस पढ़ने के लिए कहते थे। वे खुद चौकी पर बैठ जाते थे। हम दोनों बहन नीचे चटाई पर। हमलोग मानस की चोपाई का पाठ करते और बड़का बाबू उसका अर्थ कहते थे। बीच में उच्चारण में कोई त्रुटि होने पर वो उसे दूर कर देते थे। बड़का बाबू हमारे बाबू जी के तीन भाईयों में सबसे बड़े थे। कलावती बड़का बाबू की ही बेटी थी। मेरी हमउम्र बहन एवं सहेली भी।

आज संयुक्त परिवार जब समाज से विलुप्त होने के कगार पर है तब समझ में आता है कि कैसे कुछ शब्दों का महत्व भी अब ख़त्म हो रहा है। संयुक्त परिवार में पिता के अन्य भाई भी पिता के समान समझे जाते थे, उन्हें भी उतनी ही इज्जत दी जाती थी। इसलिए बाबू जी के बड़े भाई को बड़का बाबू, मंझला बाबू इत्यादि कहकर पुकारा जाता था। इस तरह के शब्द संयुक्त परिवार को जोड़कर रखने में सहायक सिद्ध होते थे।

अब जब संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार ज्यादा प्रचलित हो रहा है तो इन शब्दों की शायद जरूरत नहीं रही। शब्दों की भी पदोन्नति हो गयी है। बाबू या पिता की जगह पापा अथवा डैड ने ले ली है। बड़का बाबू, मंझला बाबू इत्यादि अब सिमटकर चाचा अथवा अंकल बन गए हैं।

मैया की कहानी, मैया की जुबानी 1

मेरा जन्म पटना से करीब 100 किलोमीटर पूरब एक छोटे से गांव में हुआ, जिसका नाम है शेरपुर। गांव के पूर्वी छोर पर गंगा बहती है, और पश्चिमी छोर पर है दिल्ली से हावड़ा को जोड़ने वाली मुख्य रेल मार्ग। मेरे घर और रेल लाइन के बीच केवल खेत ही खेत थे। बचपन से घर की खिड़की से आती जाती गाड़ियों को देखकर मैं इतना अभ्यस्त हो गयी थी कि केवल समय देखकर और गाड़ी की सीटी सुनकर मैं बता सकती थी की ये मुगलसराय पैसेंजर है, तूफ़ान एक्सप्रेस या कोई मालगाड़ी।

सन 1934 के जनवरी महीने में हमारे गाँव और उसके आस-पास के इलाके में एक भारी भूकम्प आया था। उसमे चारो ओर जान-माल की काफी क्षति हुई थी। उस समय मैं अपने माँ के गर्भ में थी। मेरी माँ बताती थी कि उसी के सात महीने बाद मेरा जन्म हुआ। उस ज़माने में जन्म दिन याद रखने और मनाने की कोई प्रथा नहीं थी। लेकिन 1934 का वो भूकम्प मेरे जन्म की तिथि निर्धारित करने में सहायक सिद्ध हुआ।

आज जब मेरे छियासी साल पुरे हो चुके हैं, बहुत सी पुरानी बातें याद आती है। जीवन से जुड़ी कई घटनाएँ, किस्से, कहानियां मेरे जेहन में कुलबुलाती हैं, बाहर आने को आतुर हैं। ऐसा लगता है की कोई सुननेवाला मिले तो उससे अपनी उन खट्टी-मीठी यादों को साझा करूँ।

सन 1942 की कई बातें मुझे याद है, भारत छोडो आंदोलन के अलावा भी। तब मैं आठ साल की थी। उसी साल मेरी सबसे बड़ी बहन सत्यभामा की शादी हुई थी, मोकामा के सकरवार टोला मे। उसकी शादी की घटनाएँ मुझे उतना याद नहीं है।

लेकिन उसके ठीक आठ दिन बाद हमारे गांव में जो एक और बारात आई थी, मोकामा के सकरवार टोला से ही, उसकी कई बातें मुझे आज भी स्पष्ट रूप से याद है। बारात काफी सज-धज कर आई थी— उसमे कई हाथी, घोड़ों के अलावा एक मोटर गाड़ी भी थी, सकरवार टोला के नामी रईस बृजनाथ प्रसाद की। मेरे लिए किसी मोटर गाड़ी को देखने का यह पहला अनुभव था। दूल्हे की पालकी, ढ़ोल, बाजे, बत्ती के साथ बारात के सबसे आगे थी। हमारे छोटे से गांव के लिए यह एक अदभुत नज़ारा था। जब बारात दुल्हन के घर के सामने रुकी, तो सारे गांव के लोग जमा थे, बारात को देखने के लिए।

अचानक किसी ने दूल्हे का चेहरा देखा और लोग बातें करने लगे कि ‘लड़का बूढा है’, ‘लड़का बूढ़ा है’। धीरे-धीरे गांव के लोग इकट्ठा हो गए और कहने लगे कि ये शादी हम नहीं होने देंगे। एक सोलह साल की लड़की की शादी पचास साल के लड़के से नहीं हो सकती। बारात के लोग जब बातचीत से नहीं माने तो लोगों ने उनके ऊपर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया, जिसमे मोटर गाड़ी का शीशा टूट गया। विरोध के इस पूरे अभियान में मेरे बड़का बाबू सबसे आगे थे। बड़का बाबू मेरे बाबूजी के तीन भाइयों में सबसे बड़े थे और बाबूजी सबसे छोटे। बाबू जी भी वहीं थे पर वो बारात के लोगों को बचाने की कोशिश कर रहे थे।

अंत में दूल्हे एवं बारात को उलटे पांव लौटना पड़ा। जाते-जाते मोकामा के लोगों ने धमकी दी कि शेरपुर का कोई भी आदमी जब कभी भी मोकामा आएगा तो हम इसका बदला जरूर लेंगे।

इस बीच हमारे गांव के राम बालक पहलवान दुल्हन को गोद में लेकर तेजी से अपने घर चले गए। हमलोगो ने जैसे ही देखा तो हमलोग भी उनके पीछे-पीछे गए। उन्होंने दुल्हन को एक कमरे में बंद कर दिया। राम बालक पहलवान के घर में भी उसी दिन एक लड़की की शादी थी, जिसके लिए पास के गांव, दरियापुर, से बारात आई हुई थी। गांववालों ने निश्चय कर लिया कि दरियापुर से आये बारात में से ही एक सुयोग्य वर ढूंढकर उस लड़की की शादी कर दी जाएगी। सचमुच वर मिल गया और उसकी शादी अगले दिन एक जवान युवक से हो गयी। एक ही दिन में उस लड़की के जीवन में एक नाटकीय बदलाव आया। कहाँ वह मोकामा के एक बुजुर्ग की पत्नी बनने वाली थी, अब उसकी शादी दरियापुर के एक नवयुवक से हो गयी।

इस शादी से जुडी कई किस्से, कहानियां बाद में काफी प्रचलित हुईं। हमें पता चला कि मोकामा की बारात में जो बुजुर्ग व्यक्ति दूल्हा बनकर आये थे उनका नाम था सन्तोखी सिंह। लड़की के पिता, महि सिंह, उन्हीं की जमीन पर मोकामा टाल में खेती करते थे और सन्तोखी सिंह के कर्जदार थे। इसीलिए गांव के लोगों को शक था की शादी के नाम पर वो अपनी बेटी को बेच रहें हैं। इस पुरे प्रकरण में महि सिंह की बड़ी बेटी, मुरली, की भूमिका काफी अहम थी। वह खुद तो बाल विधवा थीं, लेकिन अपनी छोटी बहन की शादी सन्तोखी सिंह से करवाने में काफी सक्रिय रहीं। इस सन्दर्भ में लोगों ने मुरली पर एक गीत रचा, वह गांव में काफी लोकप्रिय हुआ :

कहमॉ के दाली-चौरा, कहमॉ के टोकना,
केकरा ले खिचड़ी बनैलें, छौंरी मुरली।

मोकमा के दाली-चौरा, शेरपुर के टोकना
दरियापुर ले खिचड़ी बनैलें, छौंरी मुरली।

अपनौ खैलें, दरियापुर के खिलैलें
सन्तोखी ले जूठा नरैलें, छौरी मुरली।

बेंगलुरू

श्रोत: विकीपीडिया

बेंगलुरू महानगर में
नकाब से झांकती आंखों से
दिखता है आज भी
वही अपनापन वही मुस्कुराहट

चौड़ी सड़कें अब भी
आवारा बादलों की तरह
घूमती रहती निरंतर
अपने गंतव्य की ओर

अपार्टमेंट की ऊंचाइयों से
सुनाई पड़ती है इसकी
सागर-सी गर्जन और गूंज जो
देर रात तक चलती रहती और
बढ़ती ही रहती तेज और तेज

थकने पर बस झट से
लेती है ये एक झपकी
फिर मुंह अंधेरे ही
कोयल की एक कूक के साथ
निकल पड़ती है
नकाब चढ़ाकर
ब्रह्मांड की उस यात्रा पर
अनवरत निर्बाध अंतहीन

©अरुण जी, 07.12.21

गांधी की हत्या पर एक अमरीकी उपन्यासकार के विचार (1949)

Source: Wikimedia Foundation

“सुना तुमने, उन्होंने महात्मा को ठिकाने लगा दिया,”

एक महिला सहकर्मी ने सारा लॉरेंस कॉलेज के कॉफी हाउस में खाने की मेज पर बैठते हुए कहा। बातचीत की शुरुआत करते हुए उन्होंने महात्मा शब्द को इस लहजे में कहा मानो गांधी एक ढोंगी साधु हों, एक सपेरा।

“महात्मा?”

एक महिला अध्यापिका ने दोहराया, अपने कांटे (चम्मच-कांटा) को हवा में लहराते हुए, आंखों में एक अजीब सी चमक, मुस्कान समेटे हुए। ऐसा लग रहा था कि वो अपनी पसंदीदा खबरों, कहानियों के पात्रों, चीज़ों, जैसे कोई राजा, उसका मंत्री या उसकी पगड़ी की स्मृतियों को ताजा कर रही हों।

एक क्षण की चुप्पी के बाद बातचीत को एक गंभीर पटल पर लाकर एक पुरुष अध्यापक ने विराम दिया:

“नेहरू बेहतर हैं, एक यथार्थवादी”। इसके आगे किसी ने और कुछ नहीं कहा।

खाने की मेज की दूसरी और मैं और मेरे कुछ नए, युवा सहकर्मी सुनकर सन्न रह गए: अगर गांधी का जीवन भी, मृत्यु को छोड़ दीजिए, असफल रहा इस कठोर वैचारिक उदासीनता में बदलाव लाने में, तो हमारे लिए कहने को क्या बचा था।

शाम को लौट कर जब मैं घर आई तो मेरा नन्हा बेटा और मेरे घर की अश्वेत सहायिका भी गांधी के बारे में बातें कर रहे थे। सहायिका मेज को ठीक कर रही थी और बेटा अपने एल्बम में डाक टिकट चिपका रहा था। बेटा गुस्से में था और सहायिका दुखी।

“उन्हें गांधी को शांतिपूर्वक अपना जीवन जीने और अपना कार्य संपन्न करने देना चाहिए था,” सहायिका ने दुख व्यक्त करते हुए कहा, मानो जीवन जीने के इस हक के लिए भी उसे गुहार लगानी पर रही हो।

“गंदे हैं वे…” रुएल (मेरा लड़का) ने कहा।

एक छोटा बच्चा, एक बुजुर्ग सहायिका, मैं और मेरे कुछ मित्र, शायद इन्हीं लोगों का जिक्र कर रहे थे अखबार और रेडियो वाले जब उन्होंने घोषणा की:

“सुनकर पूरा विश्व सदमे में है वगैरह वगैरह।”

सच तो यह है कि दुनिया सदमे में नहीं थी। और अगर हम कुछ लोग गांधी की हत्या का विरोध कर भी रहे थे तो एक तरह से हम अपनी बेबसी पर रोष प्रकट कर रहे थे। हम न तो उन्हें जीवित कर सकते थे, ना हत्यारों को सजा दे सकते थे। और ना ही दूसरों को (अपने सहकर्मी शिक्षकों, तथाकथित यथार्थवादियों को भी नहीं) प्रभावित कर सकते थे, जिससे कि उन्हें थोड़ा भी दुख हो गांधी के इस तरह जाने से।

सच यह भी है कि गांधी की हत्या का विरोध केवल भगवान से ही किया जा सकता है। उसी भगवान से हम हिसाब मांगते हैं, जो एक आदर्श और अलिखित कानून की प्रतिमूर्ति के रूप में मानव जीवन को संचालित करता है। उसी की सत्ता पर ये एक आघात है।

लगता है हम सब कुछ ज्यादा ही सकारात्मक और व्यवहारिक होते जा रहे हैं। पर इस तरह के अपराध को केवल सकारात्मक एवं व्यवहारिक दृष्टिकोण से देखना इसकी भयावहता से मुख मोड़ना है। कॉलेज के काफी हाउस में हमारे सहकर्मियों का दृष्टिकोण भी कुछ इसी तरह का था। उनका कहना था कि आखिर गांधी की उम्र अब पूरी हो गई थी। वह 78 वर्ष के थे। कहने का मतलब है अब उनके उनकी मृत्यु का समय भी निकट ही था।

गांधी की हत्या के पीछे के राजनीतिक कारणों या फिर भारतीय राजनीति पर होने वाले उनके प्रभाव या फिर अहिंसा के भविष्य जैसी बातों से जोड़ना उसकी भयावहता को सीमित करने जैसा होगा। यह उतना ही भयावह है जितना किसी व्यक्ति का गांधी जैसे एक अहिंसक, असामान्य व्यक्ति की आंखों में आंखें डालकर ट्रिगर दबाना।

शायद हममें से कई लोग अभी भी मानते हैं कि अच्छाई एक तरह का हथियार है, एक गुण, जो अपराधीकरण को विराम देता है। पर अब ऐसा नहीं है। गांधी की हत्या ने यह साबित कर दिया है कि स्थिति बदल गई है। गांधी की हत्या ने यह भी सिद्ध कर दिया कि उनका प्रेम और मैत्री भाव ही उनकी हत्या का कारण बना। गांधी प्रार्थना सभा में सम्मिलित होने जा रहे थे। क्या गांधी की हत्या, उनके राजनीतिक विचारों के कारण हुई या फिर सरलता, शालीनता, प्रेम, सहिष्णुता जैसे उनके गुणों ने उनके हत्यारे को उद्वेलित कर किया? —————————————————

अमरीकी उपन्यासकार मेरी मकार्थी ने इस लेख को 1949 में लिखा था। तब वह न्यूयॉर्क के सारा लौरेंस कालेज में अध्यापिका के रूप में कार्यरत थीं।

अनुवादक: अरुण जी, 02.10.21

ऑरविल, एक आदर्श लोक: कितना सफल, कितना असफल?

Mathew T Rader, Wikimedia Foundation

पांडिचेरी से 12 किलोमीटर दूर बंगाल की खाड़ी के किनारे एक पठार पर अवस्थित ऑरविल एक ऐसा शहर है जिसकी शुरुआत महर्षि अरविंद की मृत्यु के बाद उनकी सहकर्मी एवं उत्तराधिकारी, मदर, ने 1968 में किया था। मदर ने ऑरविल के चार्टर में लिखा था कि औरेविल एक ऐसा आदर्श परिवेश होगा जहां दुनिया के किसी कोने से आकर लोग शांतिपूर्वक, प्रेम और भाईचारे के साथ रह सकेंगे। उसका उद्देश्य होगा मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना।

मदर के आह्वान पर अमेरिका, यूरोप, एशिया के विभिन्न देशों से वहां के भौतिकवादी चमक-दमक से उबकर लोग ऑरविल आने लगे, एक आदर्श जीवन बिताने। लेकिन महर्षि अरविंद के विचारों पर आधारित इस आदर्श लोक की स्थापना का ये प्रयोग कितना सफल रहा, कितना असफल?

इन्हीं बातों की जांच पड़ताल की है आकाश कपूर ने अपनी किताब बेटर टु हैव गोन में, जो कि एक शोधपरक डॉक्यूमेंट है। एक सच्ची कहानी। इस पुस्तक को लेखक ने सालों साल लेख, पत्र और कई डाक्यूमेंट्स के अध्ययन के बाद और सैकड़ों लोगों का इंटरव्यू लेकर लिखा है। यह ऑरविल के संघर्ष और उसके विकास की कहानी है। उसका इतिहास। इसके साथ ही यह एक आदर्श विचार के जीवन एवं समाज की कड़वी सच्चाई से टकराव की कहानी भी है।

ऑरविल की इस कहानी के केंद्र में हैं दो रहस्यमय मौत: एक अमरीकी पुरुष और दूसरी बेल्जियम की एक महिला का। दोनों अपने-अपने देश के भौतिकवादी जीवन से विमुख होकर ऑरविल आए थे और यहीं रहने लगे साथ-साथ, पार्टनर के रूप में। 

बेटर टु हैव गोन लेखक आकाश कपूर के जीवन की अपनी कहानी भी है। वह और उनकी पत्नी ऑरालिस दोनों ने अपना बचपन ऑरविल में बिताया था, 12 साल की उम्र तक। उसके बाद दोनों अपने-अपने रास्ते अमरीका चले गए। अमरीका में ही पढ़ाई के दौरान दोनों की मुलाकात हुई और वही उन्होंने शादी कर ली। कुछ वर्षों बाद उन दोनों का परिवार ऑरविल में रहने के लिए फिर से लौटा। उनके लौटने का एक उद्देश्य था उन दो व्यक्तियों की मौत के रहस्य से पर्दा उठाना। और उसका एक खास कारण ये था कि मृत महिला आकाश कपूर की सास थी। उनकी पत्नी, ऑरालिस, की मां।

आकाश कपूर एक पेशेवर लेखक हैं और इस पुस्तक को उन्होंने निष्पक्ष होकर लिखा है। अपनी भावनाओं को अलग रखकर। कहानी काफी रोचक है। 

एक पाठक के रूप में मैं केवल ये कह सकता हूं कि पुस्तक की कुछ बातों को थोड़ा संक्षेप में भी लिखा जा सकता था। पर ये भी सच है कि यह एक सच्ची कहानी है, काल्पनिक कथा नहीं। इसमें लेखक का उद्देश्य है सच्चाई के हरेक पहलू को उजागर करने की कोशिश करना।

©अरुण जी, 22.09.21

Sources: Better to have gone, Wikipedia