मैया की कहानी, मैया की जुबानी 6

1950-60 के आसपास भारत में शिशु मृत्यु दर काफी ज्यादा था। एक साल से कम उम्र के शिशुओं की मृत्यु सबसे ज्यादा होती थी। हमारे पड़ोस में शायद ही कोई ऐसा घर होगा जिसमें किसी एक महिला के बच्चे की मृत्यु न हुई हो। हाल में मैं अपनी बड़ी दीदी के लड़के, बिनोद, से बात कर रही थी तो उसने बताया कि 1960 में शिशु मृत्यु दर लगभग 25 प्रतिशत था। मतलब 100 में 25 बच्चे मर जाते थे। बिनोद डाक्टर है और आजकल बड़हिया के सरकारी अस्पताल का इंचार्ज। स्वास्थ्य सेवाओं की उसे अच्छी जानकारी है।

एक गर्भवती महिला को खान-पान, रहन-सहन पर काफी ध्यान देना चाहिए। पोषक तत्वों का भी ध्यान रखना होता है। अपने मायके, शेरपुर, आने के बाद मैंने अपने खाने-पीने पर उतना ध्यान नहीं दिया। शरीर की जरूरत की बजाय मैं स्वाद के अनुसार आहार लेना ज्यादा पसंद करने लगी। थोड़ी कमजोर तो मैं पहले से थी, ऊपर से गर्भावस्था और पोषक तत्वों की कमी ने हालत और नाजुक कर दी। गांव में प्रसव के पहले जांच करवाने की उतनी सुविधा नहीं थी, न ही जागरूकता।

नौवें महीने में जब मुझे असहनीय प्रसव पीड़ा शुरू हुई तो बाबूजी ने पालकी बुलवाकर मां के साथ मुझे मोकामा के पादरी अस्पताल भेजा। उस पूरे इलाके में वही एकमात्र ऐसा अस्पताल था जहां लोग 50 मील दूर से अपना इलाज करवाने आते थे: बड़हिया, बेगुसराय, लक्खीसराय, बरबीघा जैसे शहर और उनके आसपास के गांवों से। 1948 में एक छोटे पैमाने पर पादरियों के द्वारा खोला गया ये अस्पताल धीरे धीरे लोकप्रिय हो रहा था। नाम तो इसका था नाज़रेथ अस्पताल पर लोगों में ये पादरी अस्पताल के रूप में जाना जाता था।

शेरपुर से मोकामा की दूरी 12 किलोमीटर है। उस लंबी दूरी को प्रसव की असहनीय पीड़ा के साथ पालकी से मैंने कैसे तय किया, ये मेरा ईश्वर जानता है। उस समय मुझपर जो बीती, आज सोचती हूं तो सिहरन होने लगती है। दूसरा कोई साधन भी नहीं था। खैर, किसी तरह मैं अस्पताल तो पहुंच गई। पर मेरा पहला बच्चा, लड़का, पैदा होने के चार दिन बाद गुजर गया।

मेरे लिए ये एक बड़ा झटका था। नौ महीने तक शिशु को अपने गर्भ में पालना, फिर असहनीय पीड़ा के बाद उसे खो देना। बहुत ही कष्टदायक था। और ये शारीरिक कष्ट से अधिक मानसिक और भावनात्मक था।

सिजेरियन ऑपरेशन को उस समय लोग ‘बड़ी आपरेशन’ कहते थे। लेकिन मेरे प्रसव के बाद डाक्टर ने जो आपरेशन किया था, उसका नाम था ‘छोटी आपरेशन’। चिकित्सा के तकनीक का उतना विकास नहीं हुआ था। कहने को ‘छोटी आपरेशन’ था, पर अस्पताल में मुझे नौ दिन तक रहना पड़ा था।

मोकामा ससुराल होने के कारण रोज कोई न कोई मुझसे मिलने आते थे: सरकार जी(सास), ननद, जेठानी, देवर वगैरह। किन्तु उस कठिन समय में सबसे बड़े सम्बल थे मेरे पति। वे रोज शाम को आते अपने दोस्तों को लेकर। पूरी शाम मेरे पास बैठकर अपने अंदाज में हंसी ठहाके के साथ दिल बहलाया करते थे। ऐसा लगता था मानो उन पर इस बात कोई असर ही नहीं है। उनको देखकर अच्छा लगता था। जितनी देर वो साथ बैठते मैं अपना दुख भूल जाती थी।

अस्पताल से छुट्टी मिलने पर मैं शेरपुर चली गई। पति का साथ और बाबूजी, मां के स्नेह के सहारे धीरे धीरे उस दुख को भूलने लगी।

बाबूजी हम तीनों बहनों को बहुत प्यार करते थे। वे हमें ससुराल के लिए तभी विदा करना चाहते थे जब हमारे पतियों की पढ़ाई समाप्त होने के बाद नौकरी लग जाय। बड़ी दीदी को उन्होंने नौ साल शेरपुर में रखा। बड़का मेहमान(बड़की दी के पति) की नौकरी लगने के बाद ही उसका ससुराल में नियमित रूप से रहना शुरू हुआ। मंझली दीदी भी हमारे यहां लगातार बारह साल रही। इस बीच उसके बच्चों का जन्म से लेकर पालन-पोषण सब यहीं हुआ। पर मेरे मामले में ये पूरी तरह से सम्भव नहीं हो पाया।

मेरे पति उस समय मुंगेर के आर डी ऐंड डी जे कालेज में बीए के विद्यार्थी थे। कालेज से जब कभी भी छुट्टी मिलती, वो शेरपुर चले आते थे। एकबार शेरपुर में उन्हें रहने में कुछ दिक्कत हुई तो वे मुझे ससुराल (मोकामा) लेकर चले गए। बाबूजी और मां ने मना करने की कोशिश भी की पर वो एक नहीं माने।

ससुराल पहुंचने पर हाल ये था कि हमारे ससुर के तीनों भाइयों के परिवार को मिलाकर लगभग 50 लोग थे। सभी का खाना एक ही चूल्हे पर, एक साथ बनता था। हम सभी औरतें मिल कर बनाते थे। इसके अलावा भी दिन भर कुछ न कुछ काम होता ही था। करते करते मैं थक जाती थी। इसी बीच मैं फिर गर्भवती हो गई। कमजोरी इतनी हुई कि दस दिन के लिए मुझे नाज़रेथ अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। इसके बाद ससुराल में लोग मेरे स्वास्थ्य के प्रति सचेत हुए।

1956 में मुझे दूसरी संतान की प्राप्ति हुई। इस बार लड़की हुई, जिसे पाकर मैं फूले नहीं समाई। उसका नाम हमने उषा रखा। मेरे जीवन में वो उषा की किरण की तरह आई। सुन्दर और सुडौल। जल्द ही उषा परिवार की लाडली बन गई। पतिदेव के भाई लोग उसे गोद में उठाए रहते थे। जब कभी भी मैं उसे बंगला(दालान) पर भिजवाती तो मेरे भैंसुर लोग गर्व से गोद में लेकर उसे घूमते थे। आज मेरे चार बच्चे हैं। पर अभी भी लोग कहते हैं कि उषा के इतनी सुन्दर कोई नहीं है, बिल्कुल अपने पिता पर गई थी।

उषा के आने के बाद पहले संतान को खोने का ग़म मैं एकदम भूल गयी। मेरे जीवन की वो धूरी बन गई। उसी के चारो ओर मेरा जीवन घूमने लगा। आठ महीने कैसे गुजर गए, पता ही नहीं चला।

देखते देखते नागपंचमी आ गया। वर्षा ऋतु का ये पर्व सावन के पांचवें दिन हमारे क्षेत्र में काफी धूमधाम से मनाया जाता है। नाग देवता की पूजा होती है। बरसात के दिनों में सांपों का प्रकोप गांव देहात में बढ़ जाता है। शायद इसीलिए इस त्योहार को मनाने और उसमें नीम की पत्तियों के प्रयोग की प्रथा शुरू हुई होगी।

सुबह से घर में त्योहार की धूम थी। सभी लोग व्यस्त थे। दिन की शुरुआत हुई नीम की पांच पत्तियों के साथ दही खाने से। कुछ लोग हरेक कमरे के आगे नीम की एक एक टहनी को लगा रहे थे। नाग की पूजा के लिए दूध और धान का लावा परोसा जा रहा था। खाने के व्यंजन जैसे फुटपुर(दलपूरी), तसमय(खीर) इत्यादि बन रहे थे और लोग खा रहे थे। फलों में आम और कटहल का कोवा।

इधर मेरी बेटी उषा को सुबह से ही दस्त होने लगा। मुझे बच्चों की बीमारी के बारे में न कोई जानकारी थी, ना ही कोई अनुभव। मैंने तुरंत ही सरकार जी को इसकी सूचना दी। पतिदेव घर में थे पर इस बारे में वो कोई फैसला नहीं ले सकते थे। वैसे भी वो एक विद्यार्थी थे। अभी नौकरी नहीं लगी थी। खुद भी अपनी पढ़ाई के लिए मालिक के ऊपर निर्भर थे। नियम ये था कि घर का कोई भी सदस्य अगर बीमार पड़े तो उसके इलाज की जिम्मेवारी मालिक की होती थी। मालिक मतलब परिवार का मुखिया। प्रायः ऐसा होता था कि मालिक सबसे पहले वैद्य जी को बुलवाते थे। वैद्य जी की दवा का अगर असर नहीं हुआ, फिर उसे एलोपैथिक डाक्टर के पास या अस्पताल भेजा जाता था।

उषा के मामले भी यही हुआ। वैद्य जी ने दवा दी, कोई असर नहीं हुआ। दोपहर तक शरीर में पानी की कमी होने के कारण उसकी हालत बिगड़ने लगी। जब मैं रोने पीटने लगी तो फिर जल्दी से उसे अस्पताल ले जाने की व्यवस्था की गई। पर तब तक देर हो चुकी थी। अस्पताल के रास्ते में ही मेरी प्यारी बेटी उषा चल बसी।

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Photo: Tara Devi, 31 October 2016
Photo credit: Arun Jee

मैया की कहानी, मैया की जुबानी 4

शेरपुर में हमारा घर मिट्टी का था, उपर खपरैल। हमारे गांव में उस समय शायद सारे घर कच्ची दीवारों के ही थे। एक बार हमारे पड़ोस में चोरी हुई थी। चोर रात में घर के पीछे वाली दीवार में सेंध मारकर अंदर दाखिल हो गया। कच्ची दीवारों में सेंध मारना आसान होता है। सुबह उठकर लोगों ने देखा कि उनके घर के सारे पेटी बक्से, जिनमें कीमती कपड़े एवं जेवर थे, गायब थे।

इस तरह की चोरियां हमारे यहां आए दिन होती थीं। हमारे घर में भी एक दो बार हुई थी। एक बार तो मेरे भाई, चंद्रमौली, ने रात में ही चोर को पकड़ लिया था। वो भी एक अलग कहानी है। बहरहाल मिट्टी के हमारे घर उतने सुरक्षित नहीं थे।

मेरी शादी की तैयारी के सिलसिले में बाबूजी कई बार मोकामा मेरे ससुराल जाया करते थे। वहां से लौटने के बाद मां को बहुत सारी बातें बताया करते थे: घर-बार, लडका, उसके परिवार इत्यादि के बारे में। उस बातचीत में मैं शामिल नहीं होती थी, पर उन बातों को मैं छुप-छुप कर सुना करती थी। वो बताते थे कि पक्का का बहुत बड़ा मकान है। सुनकर काफी गर्व महसूस होता था।

मोकामा का घर गांव के पारंपरिक वास्तुकला का एक नमूना था। रोड के सामने ऊंची दीवार थी जिसके बीचो-बीच उपर चढ़ने के लिए कई सीढ़ियां। सीढ़ियों पे चढ़कर आपको एक मैदान मिलेगा, इतना बड़ा कि उसपर बच्चे गुल्ली-डंडा खेलते थे। मैदान के दांई ओर एक बड़ा चबूतरा और फिर सामने और बाईं ओर एल के आकार का खपरैल का दालान था जिसे हम बंगला भी कहते थे। सामने वाले दालान पर चढ़ने के लिए चार पांच और सीढ़ियां। फिर ठीक उसके बीचो-बीच एक विशाल दरवाजा था जिससे होकर हम घर के अंदर दाखिल होते थे। घर आयताकार था जिसके चारो ओर ग्यारह कमरे बने थे और बीच में आंगन था। घर से बाहर, पर उससे बिल्कुल सटा हुआ रसोईघर था और उसी के निकट औरतों के लिए शौचालय। छत पर जाने की सीढ़ियां अंदर ही थीं। एक कुआं भी था।

जीवन के इस नए मोड़ पर कच्चे घर से पक्के घर में मेरा प्रवेश हुआ। पर इसके अलावा और भी कई बदलाव हुए जो कम महत्वपूर्ण नहीं थे। दुल्हन के रुप में जब मैं उतरी तो पूर्ण रूप से घूंघट से ढ़की हुई। कहने को मुझे एक अलग कमरा मिला था पर शुरू के कुछ दिनों में ज्यादा समय अपने दोनों पांवों को मोड़कर, चुक्कू-मुक्कू, बैठी रहती थी। घर की औरतें, लड़कियां दिन भर मुझे घेरे रहती थीं।

नई-नवेली दुल्हन के आने पर एक रस्म होता था जिसका नाम था मुंहदिखाई। रस्म तो आज भी है लेकिन नियमों में काफी बदलाव आ गया है। मुंहदिखाई के लिए घर के या फिर पास-पड़ोस के पुरुष एवं औरत जब आते थे तो उन्हें दुल्हन का चेहरा घूंघट हटा कर दिखाया जाता था। दुल्हन की आंखें एकदम बंद होती थी और चेहरा भावहीन। अगर गलती से भी किसी की आंखें खुल गईं तो लोग शिकायत करते थे। मुंह देखने के बाद हरेक व्यक्ति कुछ पैसा दुल्हन को देता था। कुल मिलाकर उस समय मुझे 15 रुपये मिले होंगे। देखने के बाद लोग अपना-अपना मत भी प्रकट करते थे कि लड़की कैसी है या जोड़ी कैसी है।

मेरी एक ही ननद हैं, उम्र में मुझसे छोटी। उनका नाम है मालती। उन्होंने कई सालों बाद मुझे बताया कि उनकी एक सखी ने जब हमारी जोड़ी के बारे में कहा कि “राम नैया डगमग, सीता मैया चौगुना”, तो उसको उन्होंने खूब बुरा भला कहा था। असल में मेरे पति उस समय एकदम दुबले-पतले थे। उनके अनुपात में मेरा वजन थोड़ा ज्यादा था।

शादी के बाद मैं तीन महीने ससुराल में रही और मेरी पहचान ही बदल गई। मेरा नाम तारा था पर मुझे लोग दुल्हन के नाम से पुकारते थे और तब तक पुकारते रहे जब-तक दूसरी दुल्हन घर में नहीं आ गई। मैं व्यक्ति वाचक से जाति वाचक संज्ञा बन गई थी। बाद में मैं अपने गांव के नाम से जानी जाती थी। मैं तारा नहीं, शेरपुर वाली बन गई। ज़िन्दगी का पूरा व्याकरण बदल गया था।

नैहर में मैं एक चुलबुली लड़की थी, रोज गंगा नहाने जाती थी। लेकिन ससुराल में अपने घूंघट में सिमटकर रह गई थी। कमरे से मुझे केवल शौच के लिए बाहर निकाला जाता था, वो भी पूरी तरह से ढ़ककर। नहीं तो खाना-पीना, नहाना उसी कमरे में होता था। नैहर के हमारे परिवार में इतनी सख्ती नहीं थी। ससुराल में हंसना भी मना था।

एक जेठानी और एक चचेरी ननद दोनों मेरी हमउम्र थीं। एक का नाम था स्वर्णलता और दूसरी थी गोदावरी। उन दोनों की शादियां हो गई थी। इसलिए जब कभी भी मौका मिलता था तो हम एक दूसरे से अपनी अपनी शादी के अनुभवों को साझा करते थे और हंसते भी थे। एक बार ऐसा हुआ कि जब हमारी हंसी की आवाज बाहर चली गई तो बाहर से एक बुजुर्ग महिला आईं और कहने लगीं कि दुल्हन को इतनी जोर से नहीं हंसना चाहिए।

©arunjee

#Mokama #Sherpur_Hathidah #Magahi #Dulhan #Womenaftermarrige

Photo 1: Tara Devi, 2015
Photo 2: Her in-law’s house, 2006
Photo credit: Arun Jee

मैया की कहानी, मैया की जुबानी 3

1950 में मैं सोलह साल की थी जब मेरी शादी हुई। आज के सन्दर्भ में शादी के लिए मेरी उम्र को कम कहा जा सकता है, गैरकानूनी भी। पर उस समय अगर लड़की सोलह साल की हो गई तो पिता को उसकी शादी की चिंता सताने लगती थी। ज्यादातर लड़कियों की शादी सोलह से कम में ही कर दी जाती थी।

पहली कड़ी में मैंने बताया था कि किस तरह मोकामा सकरवार टोला की एक बारात को हमारे गांव के लोगों ने पत्थर मारकर भगा दिया था। आठ साल बाद उसी नगर के उसी मुहल्ले में मेरी शादी ठीक हुई। मोकामा एक कस्बा है जिसे आप एक नगर भी कह सकते हैं। ये हमारे गांव के उत्तर पश्चिम में गंगा नदी के किनारे बसा है।

हमारे जमाने में शादी के मामले में लड़के लड़कियों से कोई राय-मशविरा नहीं लिया जाता था। फोटो आदान-प्रदान करने का भी कोई रिवाज नहीं था। वैसे भी फोटोग्राफी तब सामान्य लोगों में प्रचलित नहीं हुआ था। लड़की के पिता गांव गांव घूमकर कोई उपयुक्त रिश्ता ढूंढकर लड़की की शादी तय करते थे। शादी ठीक करते समय लड़के के अलावा जमीन-जायदाद, कुल-खानदान वगैरह देखा जाता था। मेरे बाबूजी ने अपने तीनों बेटियों की शादी के लिए इन सारी बातों के अलावा कई और सुविधाएं जैसे यातायात, अस्पताल, बाजार इत्यादि का भी ध्यान रखा था।

इसीलिए मेरी और मेरी बड़ी दीदी, सत्यभामा, की शादी मोकामा में हुई। और मंझली दीदी, जयमंती, की इन्दुपुर में, जो कि बड़हिया के बिल्कुल करीब है। बड़हिया भी मोकामा की तरह ही एक कस्बा है, शेरपुर के दक्खिन में गंगा के तट पर। हमारे यहां लोगों को गंगा नदी से काफी लगाव है। वो अपनी लड़कियों की शादी के लिए गंगा के किनारे बसे गांव या शहर को ज्यादा महत्व देते थे।

शादी के समय मेरे पति की उम्र 19 साल थी। वो पांच भाइयों में तीसरे नंबर पर थे। मैट्रिक के विद्यार्थी थे। एकदम गोरे चिट्टे, तीखे नैन-नक्श। गोरा रंग और लम्बी, पतली नाक सुन्दरता के महत्वपूर्ण मापदंड थे, आज भी हैं। क्यों हैं ये पता नहीं।

बारात जब हमारे दरवाजे पर लगी तो मेरी सहेलियों ने उन्हें देखा और घर में आकर मुझे चिढ़ाने लगे कि लड़का तो एकदम अंग्रेज लगता है। उसी समय मेरे कानों में वो गीत गूंजने लगा:

रामचन्द्र दुल्हा सुहावन लागे,
अति मन भावन लागे हे,
माइ हे न जाने ब्रम्हा जी के हाथे गुन
कौशल्या जी के कोखे गुन हे।

आज भी उन्हें पहली बार देखने पर कुछ लोग उन्हें यूरोपियन समझ लेते हैं। ससुराल आने पर मुझे बताया गया कि जब वो पैदा हुए थे तो इतने सुन्दर दिखते थे अचानक किसी के मुंह से निकल गया कि ये तो सुग्गा(तोता) जैसा सुन्दर है। फिर वही उनका पुकारु नाम पड़ गया। वैसे तो उनका नाम राम बहादुर सिंह था पर बड़े लोग उन्हें सुगना और छोटे सुगो दा(दादा) या सुगो चा(चाचा) कहकर पुकारते थे।

उस सुन्दरता का एक मूल्य भी था। दहेज के रूप में बाबूजी को 6 हजार रुपया देना था। बाकी भाइयों की अपेक्षा मेरे पति के लिए दहेज की रकम थोड़ी बढ़ा दी गई थी। दहेज प्रथा के बारे में सुनकर आज की नई पीढ़ी को शायद थोड़ा धक्का लगे। पर उस समय वो काफी प्रचलित थी। वैसे किसी न किसी रूप में आज भी है। पर शायद कुछ कम हुआ है, खासकर लड़कियां जब से शिक्षित होने लगी हैं। हमारे समय में ये गैरकानूनी भी नहीं था। अरुण ने गूगल पर खोजकर मुझे बताया कि 1961 में इसे गैरकानूनी घोषित किया गया।

बाबूजी एक किसान थे। हमारे गांव में किसानों की हालत बहुत खराब थी। जमीन का एक बड़ा भाग गंगा जी के पेट में चला गया था। अपने घर की स्थिति को मैं भलिभाति जानती थी। बाबूजी दहेज देने की स्थिति में नहीं थे।

उन्होंने अपने होने वाले समधी, मेरे होने वाले ससुर, से अनुरोध किया कि दहेज की आधी रकम, तीन हजार, वो शादी में देंगे और बाकी की रकम दुरागमन के वक्त। उस समय शादियां कम उम्र में होती थीं। इसलिए शादी के प्रायः दो तीन साल बाद लड़की का दुरागमन होता था। दुरागमन मतलब लड़की का दूसरी बार ससुराल गमन। कुछ लोग इसे दूसरी शादी भी कहते थे। मेरे ससुर इस बात पर मान गए।

शादी के बाद मैं और मेरे पति एक ही पालकी में सवार होकर शेरपुर से मोकामा के लिए विदा हुए। मेरे नैहर से ससुराल की दूरी 12 किलोमीटर है। कहार पालकी ढ़ो रहे थे और बंद पालकी में मैं अपने पति के सामने पूरी तरह घूंघट ओढ़कर बैठी थी। मेरे मन में मिश्रित भावनाएं थीं: घर से विदाई का ग़म, ससुराल के बारे में आशंकाएं, पति से मधुर मिलन की दबी इच्छाएं वगैरह वगैरह। उन यादों को जब कुरेदती हूं तो मदर इंडिया का वो गाना याद आने लगता है:

पी के घर आज प्यारी दुल्हनियां चली
रोये माता पिता उनकी दुनियां चली।

#Bihar #Mokama #Magahigeet #Maiyakikahani

मैया की कहानी, मैया की जुबानी 2

हमलोग चार भाई बहन थे— तीन बहन और एक भाई। तीनो बहनों में मैं सबसे छोटी थी और भाई हम सबसे छोटा। वह मुझसे आठ वर्ष छोटा है। उसके जन्म होने के पहले मैं घर में सबसे छोटी थी, सबकी लाड़ली भी। उस ज़माने में बेटे और बेटियों में बहुत भेद-भाव किया जाता था। वैसे तो यह फ़र्क आज भी किसी न किसी रूप में बरक़रार है। पर मेरे बाबू जी के विचार बिल्कुल अलग थे। वे अपनी बेटियों को पढ़ाना चाहते थे। पहली दो बेटियों में तो वे सफ़ल नहीं हो सके, लेकिन मुझे वे पर्याप्त शिक्षा प्रदान करना चाहते थे। शुरू के वर्षों में घर में बेटा नहीं होने के कारण मेरा लालन-पालन भी बेटे के जैसा ही हुआ।

मेरा पहला स्कूल मेरे गांव का भी इकलौता स्कूल था । उसका नाम था ‘लाला गुरू जी का स्कूल’। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है इस स्कूल के शिक्षक, कर्ता-धर्ता और सबकुछ एक ही व्यक्ति थे, लाला गुरु जी। गुरु जी गांव के बच्चों को वर्णमाला एवं पहाड़ा की शिक्षा देते थे गांव के लोग इसके बदले उन्हें जो दक्षिणा देते थे, उसी से उनका जीवन यापन होता था। एक गुरु के द्वारा चलने वाले वाले ऐसे स्कूल आसपास के गावों में काफी प्रचलित थे। स्थानीय भाषा में इसे ‘पिंडा’ भी कहा जाता था। यहाँ मैंने हिंदी वर्णमाला, गणित में पहाड़ा एवं आसान जोड़ घटाव का ज्ञान हासिल किया। आजकल स्कूलों में 1 से 12 तक ही पहाड़ा सिखाया जाता है, लेकिन लाला गुरु जी के स्कूल में हमने 1 से 30 तक का पहाड़ा से लेकर सवैया(1.25), अढ़ैया(2.5), हुठा(3.5) इत्यादि दशमलव वाले पहाड़ों को भी मैंने कंठस्त कर लिया था।

करीब पच्चीस बरसों बाद मेरे बड़े लड़के, अरुण, की प्रारंभिक शिक्षा भी इसी स्कूल से शुरू हुई। उस समय गांव में एक पर्व मनाया जाता था जिसका नाम था चकचंदा। इस पर्व के अवसर पर गुरू जी अपने शिष्यों के साथ घर-घर जाते थे और गीत गा-गा कर गुरु दक्षिणा मांगते थे। मुझे याद है कि अरुण भी गुरु जी एवं अन्य शिष्यों के साथ एक बार हमारे घर आया था।बच्चों ने उसके आँख को बंद कर दिया और वे गाने लगे:

“बबुआ रे बबुआ, लाल-लाल ढबुआ
अंखिया लाल-पियर होळौ रे बबुआ,
मैया तोर कठोरा रे बबुआ
बाबू तोर निरमोहिया रे बबुआ
जरियो नै दर्द आवहौ रे बबुआ,
भूख लगल हौ रे बबुआ
प्यास लागल हौ रे बबुआ।

हमारे घर से गुरु जी के लिए दक्षिणा लेकर वे सभी दुसरे घर चले गए।

लाला गुरु जी के यहाँ मैंने कक्षा एक एवं दो की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद की पढ़ाई के लिए हमारे गांव में कोई विकल्प नहीं था। इसलिए बाबूजी ने मेरा दाखिला पास के गांव, बादपुर, के सरकारी स्कूल में करवा दिया। वह स्कूल मेरे घर से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर था।

नया स्कूल, नया बस्ता, नयी पुस्तकों को पाकर मैं काफी उत्साहित थी। घर से बाहर जाना, बल्कि गांव से भी दूर स्कूल में जाकर नयी चीजों के बारे में जानना और सीखना — मेरी कल्पना से बिल्कुल परे था। पहले दिन का अनुभव तो एकदम आशा के अनुरूप था — मैं स्कूल गयी और घर लौट कर आई, पूरे उत्साह और उमंग के साथ।

लेकिन दुसरे दिन मैं जैसे ही घर से बाहर निकली कि मेरे एक चचेरे भाई, जो मुझसे करीब २० साल बड़े होंगे, ने मुझे रोककर मेरा बस्ता छीन लिया और गुस्से में आकर कहा, “खबरदार! आज से तुम्हारा स्कूल जाना बंद। इसके बाद अगर मैंने तुम्हें स्कूल जाते हुए देखा, तो तुम्हारे हाथ पैर तोड़ दूंगा।”

बाद में उन्होंने मेरे बाबूजी को भी इसके लिए बुरा भला कहा। असल में हमारे इस भाई साहब ने हमारे संयुक्त परिवार के प्रतिष्ठा की सुरक्षा का बीड़ा उठा रखा था। इसलिए खासकर औरतों और बेटियों को बाहर भेजने पर उन्होंने पाबन्दी लगा रखी थी। अपने इस दायित्व को वह धर्म के रूप में निभाते थे।

पर बाबूजी ने हार नहीं मानी। अखबार इत्यादि के माध्यम से उन्होंने घर में ही मुझे पढ़ना और लिखना सिखलाया। थोड़ी बड़ी होने के बाद चिट्ठी पढ़ने और लिखने में मुझे दिक्कत नहीं होती थी। गांव में किसी के घर डाक से चिठ्ठी आती तो कई बार लोग मुझे बुलाने आते थे। मैं उनको चिठियां पढ़कर सुनाया करती थी।

अखबार के अलावा धीरे-धीरे मैं धार्मिक पुस्तकें भी पढ़ने लगी। उस समय रामायण, गीता, महाभारत जैसी पुस्तकें लोग घर-घर में पढ़ा करते थे। मेरे गांव में कई ऐसे व्यक्ति थे जिन्हे धार्मिक पुस्तकों की पंक्तियाँ पूरी तरह से याद थी। इन पुस्तकों का पाठ एवं गायन हमारे सामाजिक जीवन का एक अभिन्न अंग था।

मैं 13 या 14 वर्ष की हो गई होंगी जब मुझे और मेरी चचेरी बहन, कलावती, को बड़का बाबू शाम को बंगला(दालान) पर बुलाते थे और रामचरितमानस पढ़ने के लिए कहते थे। वे खुद चौकी पर बैठ जाते थे। हम दोनों बहन नीचे चटाई पर। हमलोग मानस की चोपाई का पाठ करते और बड़का बाबू उसका अर्थ कहते थे। बीच में उच्चारण में कोई त्रुटि होने पर वो उसे दूर कर देते थे। बड़का बाबू हमारे बाबू जी के तीन भाईयों में सबसे बड़े थे। कलावती बड़का बाबू की ही बेटी थी। मेरी हमउम्र बहन एवं सहेली भी।

आज संयुक्त परिवार जब समाज से विलुप्त होने के कगार पर है तब समझ में आता है कि कैसे कुछ शब्दों का महत्व भी अब ख़त्म हो रहा है। संयुक्त परिवार में पिता के अन्य भाई भी पिता के समान समझे जाते थे, उन्हें भी उतनी ही इज्जत दी जाती थी। इसलिए बाबू जी के बड़े भाई को बड़का बाबू, मंझला बाबू इत्यादि कहकर पुकारा जाता था। इस तरह के शब्द संयुक्त परिवार को जोड़कर रखने में सहायक सिद्ध होते थे।

अब जब संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार ज्यादा प्रचलित हो रहा है तो इन शब्दों की शायद जरूरत नहीं रही। शब्दों की भी पदोन्नति हो गयी है। बाबू या पिता की जगह पापा अथवा डैड ने ले ली है। बड़का बाबू, मंझला बाबू इत्यादि अब सिमटकर चाचा अथवा अंकल बन गए हैं।

मैया की कहानी, मैया की जुबानी 1

मेरा जन्म पटना से करीब 100 किलोमीटर पूरब एक छोटे से गांव में हुआ, जिसका नाम है शेरपुर। गांव के पूर्वी छोर पर गंगा बहती है, और पश्चिमी छोर पर है दिल्ली से हावड़ा को जोड़ने वाली मुख्य रेल मार्ग। मेरे घर और रेल लाइन के बीच केवल खेत ही खेत थे। बचपन से घर की खिड़की से आती जाती गाड़ियों को देखकर मैं इतना अभ्यस्त हो गयी थी कि केवल समय देखकर और गाड़ी की सीटी सुनकर मैं बता सकती थी की ये मुगलसराय पैसेंजर है, तूफ़ान एक्सप्रेस या कोई मालगाड़ी।

सन 1934 के जनवरी महीने में हमारे गाँव और उसके आस-पास के इलाके में एक भारी भूकम्प आया था। उसमे चारो ओर जान-माल की काफी क्षति हुई थी। उस समय मैं अपने माँ के गर्भ में थी। मेरी माँ बताती थी कि उसी के सात महीने बाद मेरा जन्म हुआ। उस ज़माने में जन्म दिन याद रखने और मनाने की कोई प्रथा नहीं थी। लेकिन 1934 का वो भूकम्प मेरे जन्म की तिथि निर्धारित करने में सहायक सिद्ध हुआ।

आज जब मेरे छियासी साल पुरे हो चुके हैं, बहुत सी पुरानी बातें याद आती है। जीवन से जुड़ी कई घटनाएँ, किस्से, कहानियां मेरे जेहन में कुलबुलाती हैं, बाहर आने को आतुर हैं। ऐसा लगता है की कोई सुननेवाला मिले तो उससे अपनी उन खट्टी-मीठी यादों को साझा करूँ।

सन 1942 की कई बातें मुझे याद है, भारत छोडो आंदोलन के अलावा भी। तब मैं आठ साल की थी। उसी साल मेरी सबसे बड़ी बहन सत्यभामा की शादी हुई थी, मोकामा के सकरवार टोला मे। उसकी शादी की घटनाएँ मुझे उतना याद नहीं है।

लेकिन उसके ठीक आठ दिन बाद हमारे गांव में जो एक और बारात आई थी, मोकामा के सकरवार टोला से ही, उसकी कई बातें मुझे आज भी स्पष्ट रूप से याद है। बारात काफी सज-धज कर आई थी— उसमे कई हाथी, घोड़ों के अलावा एक मोटर गाड़ी भी थी, सकरवार टोला के नामी रईस बृजनाथ प्रसाद की। मेरे लिए किसी मोटर गाड़ी को देखने का यह पहला अनुभव था। दूल्हे की पालकी, ढ़ोल, बाजे, बत्ती के साथ बारात के सबसे आगे थी। हमारे छोटे से गांव के लिए यह एक अदभुत नज़ारा था। जब बारात दुल्हन के घर के सामने रुकी, तो सारे गांव के लोग जमा थे, बारात को देखने के लिए।

अचानक किसी ने दूल्हे का चेहरा देखा और लोग बातें करने लगे कि ‘लड़का बूढा है’, ‘लड़का बूढ़ा है’। धीरे-धीरे गांव के लोग इकट्ठा हो गए और कहने लगे कि ये शादी हम नहीं होने देंगे। एक सोलह साल की लड़की की शादी पचास साल के लड़के से नहीं हो सकती। बारात के लोग जब बातचीत से नहीं माने तो लोगों ने उनके ऊपर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया, जिसमे मोटर गाड़ी का शीशा टूट गया। विरोध के इस पूरे अभियान में मेरे बड़का बाबू सबसे आगे थे। बड़का बाबू मेरे बाबूजी के तीन भाइयों में सबसे बड़े थे और बाबूजी सबसे छोटे। बाबू जी भी वहीं थे पर वो बारात के लोगों को बचाने की कोशिश कर रहे थे।

अंत में दूल्हे एवं बारात को उलटे पांव लौटना पड़ा। जाते-जाते मोकामा के लोगों ने धमकी दी कि शेरपुर का कोई भी आदमी जब कभी भी मोकामा आएगा तो हम इसका बदला जरूर लेंगे।

इस बीच हमारे गांव के राम बालक पहलवान दुल्हन को गोद में लेकर तेजी से अपने घर चले गए। हमलोगो ने जैसे ही देखा तो हमलोग भी उनके पीछे-पीछे गए। उन्होंने दुल्हन को एक कमरे में बंद कर दिया। राम बालक पहलवान के घर में भी उसी दिन एक लड़की की शादी थी, जिसके लिए पास के गांव, दरियापुर, से बारात आई हुई थी। गांववालों ने निश्चय कर लिया कि दरियापुर से आये बारात में से ही एक सुयोग्य वर ढूंढकर उस लड़की की शादी कर दी जाएगी। सचमुच वर मिल गया और उसकी शादी अगले दिन एक जवान युवक से हो गयी। एक ही दिन में उस लड़की के जीवन में एक नाटकीय बदलाव आया। कहाँ वह मोकामा के एक बुजुर्ग की पत्नी बनने वाली थी, अब उसकी शादी दरियापुर के एक नवयुवक से हो गयी।

इस शादी से जुडी कई किस्से, कहानियां बाद में काफी प्रचलित हुईं। हमें पता चला कि मोकामा की बारात में जो बुजुर्ग व्यक्ति दूल्हा बनकर आये थे उनका नाम था सन्तोखी सिंह। लड़की के पिता, महि सिंह, उन्हीं की जमीन पर मोकामा टाल में खेती करते थे और सन्तोखी सिंह के कर्जदार थे। इसीलिए गांव के लोगों को शक था की शादी के नाम पर वो अपनी बेटी को बेच रहें हैं। इस पुरे प्रकरण में महि सिंह की बड़ी बेटी, मुरली, की भूमिका काफी अहम थी। वह खुद तो बाल विधवा थीं, लेकिन अपनी छोटी बहन की शादी सन्तोखी सिंह से करवाने में काफी सक्रिय रहीं। इस सन्दर्भ में लोगों ने मुरली पर एक गीत रचा, वह गांव में काफी लोकप्रिय हुआ :

कहमॉ के दाली-चौरा, कहमॉ के टोकना,
केकरा ले खिचड़ी बनैलें, छौंरी मुरली।

मोकमा के दाली-चौरा, शेरपुर के टोकना
दरियापुर ले खिचड़ी बनैलें, छौंरी मुरली।

अपनौ खैलें, दरियापुर के खिलैलें
सन्तोखी ले जूठा नरैलें, छौरी मुरली।

बेंगलुरू

श्रोत: विकीपीडिया

बेंगलुरू महानगर में
नकाब से झांकती आंखों से
दिखता है आज भी
वही अपनापन वही मुस्कुराहट

चौड़ी सड़कें अब भी
आवारा बादलों की तरह
घूमती रहती निरंतर
अपने गंतव्य की ओर

अपार्टमेंट की ऊंचाइयों से
सुनाई पड़ती है इसकी
सागर-सी गर्जन और गूंज जो
देर रात तक चलती रहती और
बढ़ती ही रहती तेज और तेज

थकने पर बस झट से
लेती है ये एक झपकी
फिर मुंह अंधेरे ही
कोयल की एक कूक के साथ
निकल पड़ती है
नकाब चढ़ाकर
ब्रह्मांड की उस यात्रा पर
अनवरत निर्बाध अंतहीन

©अरुण जी, 07.12.21

गांधी, एक आलेख: लेखिका, मेरी मकार्थी, 1949

Source: Wikimedia Foundation

“सुना तुमने, उन्होंने महात्मा को ठिकाने लगा दिया,” एक महिला सहकर्मी ने सारा लॉरेंस कॉलेज के कॉफी हाउस में खाने की मेज पर बैठते हुए कहा। बातचीत की शुरुआत करते हुए उन्होंने महात्मा शब्द को इस लहजे में कहा मानो गांधी एक ढोंगी साधु हों, एक सपेरा। “महात्मा,” एक महिला अध्यापिका ने दोहराया, अपने कांटे(चम्मच-कांटा) को हवा में लहराते हुए, आंखों में एक अजीब सी चमक, मुस्कान समेटे हुए। ऐसा लग रहा था कि वो अपनी पसंदीदा खबरों, कहानियों के पात्रों, चीज़ों, जैसे कोई राजा, उसका मंत्री या उसकी पगड़ी की स्मृतियों को ताजा कर रही हों।

एक क्षण की चुप्पी के बाद बातचीत को एक गंभीर पटल पर लाकर एक पुरुष अध्यापक ने विराम दिया, “नेहरू बेहतर हैं, एक यथार्थवादी”। इसके आगे किसी ने और कुछ नहीं कहा।

खाने की मेज की दूसरी और मैं और हमारे कुछ नए, युवा सहकर्मी सुनकर सन्न रह गए: अगर गांधी का जीवन भी, मृत्यु को छोड़ दीजिए, असफल रहा इस कठोर वैचारिक उदासीनता में बदलाव लाने में, तो हमारे लिए कहने को क्या बचा था।

शाम को लौट कर जब मैं घर आई तो मेरा नन्हा बेटा और मेरे घर की अश्वेत सहायिका भी गांधी के बारे में बातें कर रहे थे। सहायिका मेज को ठीक कर रही थी और बेटा अपने एल्बम में डाक टिकट चिपका रहा था। बेटा गुस्से में था और सहायिका दुखी। “उन्हें गांधी को शांतिपूर्वक अपना जीवन जीने और अपना कार्य संपन्न करने देना चाहिए था,” सहायिका ने दुख व्यक्त करते हुए कहा, मानो जीवन जीने के इस हक के लिए भी उसे गुहार लगानी पर रही हो। “गंदे हैं वे…” रुएल (मेरा लड़का) ने कहा।

एक छोटा बच्चा, एक बुजुर्ग सहायिका, मैं और मेरे कुछ मित्र, शायद इन्हीं लोगों का जिक्र कर रहे थे अखबार और रेडियो वाले जब उन्होंने घोषणा की, “सुनकर पूरा विश्व सदमे में है वगैरह वगैरह।” सच तो यह है कि दुनिया सदमे में नहीं थी। और अगर हम कुछ लोग गांधी की हत्या का विरोध कर भी रहे थे तो एक तरह से हम अपनी बेबसी पर रोष प्रकट कर रहे थे। हम न तो उन्हें जीवित कर सकते थे, ना हत्यारों को सजा दे सकते थे और ना ही दूसरों को(अपने सहकर्मी शिक्षकों, तथाकथित यथार्थवादियों, को भी नहीं) प्रभावित कर सकते थे, जिससे कि उन्हें थोड़ा भी दुख हो गांधी के इस तरह से जाने से।

सच यह भी है कि गांधी की हत्या का विरोध केवल भगवान से ही किया जा सकता है। उसी भगवान से हम हिसाब मांगते हैं, जो एक आदर्श और अलिखित कानून की प्रतिमूर्ति के रूप में मानव जीवन को संचालित करता है। उसी की सत्ता पर ये एक आघात है।

लगता है हम सब कुछ ज्यादा ही सकारात्मक और व्यवहारिक होते जा रहे हैं। पर इस तरह के अपराध को केवल सकारात्मक एवं व्यवहारिक दृष्टिकोण से देखना इसकी भयावहता से मुख मोड़ना है। कॉलेज के काफी हाउस में हमारे सहकर्मी का दृष्टिकोण भी कुछ इसी तरह का था। उनका कहना था कि आखिर गांधी की उम्र अब पूरी हो गई थी। वह 78 वर्ष के थे। कहने का मतलब है अब उनके उनकी मृत्यु का समय भी निकट ही था।

गांधी की हत्या के पीछे के राजनीतिक कारणों या फिर भारतीय राजनीति पर होने वाले उसके प्रभाव या फिर अहिंसा के भविष्य जैसी बातों से जोड़ना उसकी भयावहता को सीमित करने जैसा होगा। यह उतना ही भयावह है जितना किसी व्यक्ति का गांधी जैसे एक अहिंसक, असामान्य व्यक्ति की आंखों में आंखें डालकर ट्रिगर दबाना। शायद हममें से कई लोग अभी भी मानते हैं कि अच्छाई एक तरह का हथियार है, एक गुण जो अपराधीकरण को विराम देता है। पर अब ऐसा नहीं है। गांधी की हत्या ने यह साबित कर दिया है कि स्थिति बदल गई है। गांधी की हत्या ने यह भी सिद्ध कर दिया कि उनका प्रेम और मैत्री भाव ही उनकी हत्या का कारण बना। गांधी प्रार्थना सभा में सम्मिलित होने जा रहे थे। क्या गांधी की हत्या, उनके राजनीतिक विचारों के कारण हुई या फिर सरलता, शालीनता, प्रेम, सहिष्णुता जैसे उनके गुणों ने उनके हत्यारे को उद्वेलित कर किया?

(मेरी मकार्थी ने इसे 1949 में लिखा था। तब वह न्यूयॉर्क के सारा लौरेंस कालेज में अध्यापिका के रूप में कार्यरत थीं।)

अनुवादक: अरुण जी, 02.10.21

ऑरविल, एक आदर्श लोक: कितना सफल, कितना असफल?

Mathew T Rader, Wikimedia Foundation

पांडिचेरी से 12 किलोमीटर दूर बंगाल की खाड़ी के किनारे एक पठार पर अवस्थित ऑरविल एक ऐसा शहर है जिसकी शुरुआत महर्षि अरविंद की मृत्यु के बाद उनकी सहकर्मी एवं उत्तराधिकारी, मदर, ने 1968 में किया था। मदर ने ऑरविल के चार्टर में लिखा था कि औरेविल एक ऐसा आदर्श परिवेश होगा जहां दुनिया के किसी कोने से आकर लोग शांतिपूर्वक, प्रेम और भाईचारे के साथ रह सकेंगे। उसका उद्देश्य होगा मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना।

मदर के आह्वान पर अमेरिका, यूरोप, एशिया के विभिन्न देशों से वहां के भौतिकवादी चमक-दमक से उबकर लोग ऑरविल आने लगे, एक आदर्श जीवन बिताने। लेकिन महर्षि अरविंद के विचारों पर आधारित इस आदर्श लोक की स्थापना का ये प्रयोग कितना सफल रहा, कितना असफल?

इन्हीं बातों की जांच पड़ताल की है आकाश कपूर ने अपनी किताब बेटर टु हैव गोन में, जो कि एक शोधपरक डॉक्यूमेंट है। एक सच्ची कहानी। इस पुस्तक को लेखक ने सालों साल लेख, पत्र और कई डाक्यूमेंट्स के अध्ययन के बाद और सैकड़ों लोगों का इंटरव्यू लेकर लिखा है। यह ऑरविल के संघर्ष और उसके विकास की कहानी है। उसका इतिहास। इसके साथ ही यह एक आदर्श विचार के जीवन एवं समाज की कड़वी सच्चाई से टकराव की कहानी भी है।

ऑरविल की इस कहानी के केंद्र में हैं दो रहस्यमय मौत: एक अमरीकी पुरुष और दूसरी बेल्जियम की एक महिला का। दोनों अपने-अपने देश के भौतिकवादी जीवन से विमुख होकर ऑरविल आए थे और यहीं रहने लगे साथ-साथ, पार्टनर के रूप में। 

बेटर टु हैव गोन लेखक आकाश कपूर के जीवन की अपनी कहानी भी है। वह और उनकी पत्नी ऑरालिस दोनों ने अपना बचपन ऑरविल में बिताया था, 12 साल की उम्र तक। उसके बाद दोनों अपने-अपने रास्ते अमरीका चले गए। अमरीका में ही पढ़ाई के दौरान दोनों की मुलाकात हुई और वही उन्होंने शादी कर ली। कुछ वर्षों बाद उन दोनों का परिवार ऑरविल में रहने के लिए फिर से लौटा। उनके लौटने का एक उद्देश्य था उन दो व्यक्तियों की मौत के रहस्य से पर्दा उठाना। और उसका एक खास कारण ये था कि मृत महिला आकाश कपूर की सास थी। उनकी पत्नी, ऑरालिस, की मां।

आकाश कपूर एक पेशेवर लेखक हैं और इस पुस्तक को उन्होंने निष्पक्ष होकर लिखा है। अपनी भावनाओं को अलग रखकर। कहानी काफी रोचक है। 

एक पाठक के रूप में मैं केवल ये कह सकता हूं कि पुस्तक की कुछ बातों को थोड़ा संक्षेप में भी लिखा जा सकता था। पर ये भी सच है कि यह एक सच्ची कहानी है, काल्पनिक कथा नहीं। इसमें लेखक का उद्देश्य है सच्चाई के हरेक पहलू को उजागर करने की कोशिश करना।

©अरुण जी, 22.09.21

Sources: Better to have gone, Wikipedia

Conversations with Prof Kapil Muni Tiwary 6

Courtesy: Wikimedia Commons

An eminent scholar of Linguistics, Prof Kapil Muni Tiwary was well-known for his impeccable pronunciation and speech in Patna University. But very few people know that his pronunciation was not all that great in the initial part of his career and the students made fun of him.

In this episode he shares how he converted his weaknesses into his strengths as an English teacher. He also mentions the nicknames that he had received from the students and what led to his drift towards Linguistics.

Me: Sir, could you share your initial experiences as a lecturer of English at Patna university?

Prof Tiwary: Well, when I started teaching English in Patna university in 1955, I had very little or no idea of the details of the language as such. There were many books of English grammar like those of Nesfield or Wren & Martin etc. You had gone through them in your school days. But there was no guidance, at least I hadn’t received any guidance for my spoken English.

I started my career from Patna Science College where the best of the students would come from all over Bihar. Some of these students would come there from the missionary schools like St Xaviour’s or St Joseph Convent Patna where the medium of instruction is English. They sometimes ridiculed or laughed at those teachers whose accent or pronunciation was anything but English. I became aware of the fact that I was not trained for spoken English and I must do something about it myself.

There were some teachers too who would laugh at you. The teachers like Prof Devidas Chatterjee would come to you one day and say:

“Hey, how about अपालिन्ग.”

He would make fun of your incorrect pronunciation of the word, Appalling. It was because many of us used what you would like to call the spelling pronunciation. It was common for the teachers to mispronounce the words like folk in which l is silent. Though the situation in Patna university was better than that in other universities of Bihar, there was a lot of scope for improvement.

I took it as a challenge and I started working on the improvement of my spoken English.

In 1955 Ford Foundation gave financial assistance to set up an advanced centre for English at Deccan College, Pune. It was the same year when I had joined Patna university. I started looking for an opportunity to join a course there. I got that opportunity two years later when I was sent by the university to Deccan College.

Deccan college used to award two courses: one year diploma and two year diploma. I took the course of one year diploma. While doing that course I joined a short summer course on Linguistics to earn credit points.
There I got introduced to the different branches of Linguistics like Phonetics, Morphology, Syntax, Semantics there etc.

And then I realised that for a teacher to describe the sounds is not enough. To say that f in four is a labiodental voiceless fricative is just to preach and not to practice. You must know how to make others say four or flower, and not फोर or फ्लावर. It should be f, and not ph in four or flower. And you shouldn’t pronounce fool as phool.Me: Sir, what were the nicknames that you received from your students while you were teaching at Patna university?

Prof Tiwary: In Science college I used to teach The Old Man and the Sea by Ernest Hemingway. I stuck to it for such a long time that I became known as an old man.

The other day I met somebody. I thought he was older than me. But surprisingly he revealed that he used to be my student at Science college in those days. He said that the students used to address me as ‘Old man’. As soon as I entered their class they would start whispering, ‘The old man has come, the old man has come’.

In the post graduate classes those days I would be called ‘Yespersen’ by the students. It was because I used to teach the book of The History of the English language by Otto Jespersen. Yespersen was the correct pronunciation of Jesperson. Listening to this name over and over again from me they would address me as Yesperson.

Again in the PG department I used to teach Ben Johnson’s Volpone in the initial period of my career. Volpone is a famous play by Ben Johnson in which the name of the chief protagonist is also Volpone.

I would begin the class with a famous dialogue of Volpone:
“Good morning to the day; and next, my Gold!
Open the shrine, that I may see my saint.
Hail the world’s soul and mine!”

Generally you would hear greetings like good morning, good evening etc in English. Ben Johnson’s character, however, would begin by saying, ‘Good morning to the day’.

So while teaching that play I would also start with the same greeting in the class. It was unusual for the students to hear such a greeting.

About this Dr D D Sharma, one of my students in the class in those days, would say that we thought you would never move away from that speech of Volpone.

Dr Sharma himself became a professor of English later. He retired as HOD of English from Lucknow university. We would remain in touch with each other during conferences or for research in the language or literature.

I translated the first four lines of Volpone’s dialogue: Ganeshay Namah, Shivay Namah, Suvarnay Namah etc. That made the class a little more interesting.

Me: Sir, what were the nicknames that you received from your students while you were teaching at Patna university?

Prof Tiwary: In Science college I used to teach The Old Man and the Sea by Ernest Hemingway. I stuck to it for such a long time that I became known as an old man.

The other day I met somebody. I thought he was older than me. But surprisingly he revealed that he used to be my student at Science college in those days. He said that the students used to address me as ‘Old man’. As soon as I entered their class they would start whispering, ‘The old man has come, the old man has come’.

In the post graduate classes those days I would be called ‘Yespersen’ by the students. It was because I used to teach the book of The History of the English language by Otto Jespersen. Yespersen was the correct pronunciation of Jesperson. Listening to this name over and over again from me they would address me as Yesperson.

Again in the PG department I used to teach Ben Johnson’s Volpone in the initial period of my career. Volpone is a famous play by Ben Johnson in which the name of the chief protagonist is also Volpone.

I would begin the class with a famous dialogue of Volpone:
“Good morning to the day; and next, my Gold!
Open the shrine, that I may see my saint.
Hail the world’s soul and mine!”

Generally you would hear greetings like good morning, good evening etc in English. Ben Johnson’s character, however, would begin by saying, ‘Good morning to the day’.

So while teaching that play I would also start with the same greeting in the class. It was unusual for the students to hear such a greeting.

About this Dr D D Sharma, one of my students in the class in those days, would say that we thought you would never move away from that speech of Volpone.

Dr Sharma himself became a professor of English later. He retired as HOD of English from Lucknow university. We would remain in touch with each other during conferences or for research in the language or literature.

I translated the first four lines of Volpone’s dialogue: Ganeshay Namah, Shivay Namah, Suvarnay Namah etc. That made the class a little more interesting.

Me: Was it in the course of your teaching in the post graduate department that your interest started growing in languages and Linguistics?

Prof Tiwary: Yes, it did. But there was another context. And that was Prof Kripa Nath Mishra, the HOD of English at Patna Science college.

Prof K N Mishra kindled my interest in Linguistics. Prof Mishra was a BA (Hons) from London University and Linguistics was a part of his course there. He was a contemporary of Prof Kalimuddin Ahmed and Prof Fazilur Rehman. He had been a teacher of Dr R K Sinha.

Much before I joined the university Prof Mishra had designed a typewriter. The design had been purchased by a German company for which he used to receive royalty on a regular basis. Sometimes Prof Mishra would say in the lighter vein that the amount that he received from his royalty was more than what the Vice-Chancellor was receiving as his salary.

Conversations with Prof Kapil Muni Tiwary 5

Courtesy: Wikimedia Commons

In the previous episode Prof Tiwary had narrated the stories of his days as a student of BA at H D Jain College Arah in the early fifties.

Here he shares an experience of his interaction with a teacher in the classroom when he was a student of MA at Patna university.

Me: Sir, you have mentioned that there was hardly any programme available in the university for the new teachers to learn the nuances of pedagogy and by and large you had to learn the tricks of the trade on your own. Could you share some of the experiences of your classroom interactions with the teachers who taught you at Patna university?

Prof Tiwary: I recall one such story when I was a student in the fifth year (first year of MA) at Patna university in the early fifties. It is related to one of our senior teachers who used to teach us Joseph Conrad. The teacher would come to the class and open a page of the book. We didn’t have the book.

He would begin by saying, ”Where to, Razumov?”

“Razumov?”
I wondered.

It was a puzzle for me because Razumov is not a character in the novel, The Secret Agent by Joseph Conrad. It is in his other novel, Under Western Eyes. The teacher was supposed to teach The Secret Agent in the class. Those days you couldn’t speak against your teachers. So we all listened to him.

But one day I couldn’t hold myself. I stood up. I had the privilege of being the Vice President of the debating society of Patna university and the teacher concerned was the President of that society.

I said, “Sir, the text that you are teaching is from another book by Joseph Conrad. It is from Under Western Eyes, and not from the book prescribed, The Secret Agent.”

Well, that proved to be sacrilegious.

He looked at me and said, “Are you sure?”
“Yes Sir”, I said.
He said, “Sit down and see me after class.”

Just then the bell rang and the students filed out of the class. I quietly followed him to his room.

In order to go to his room we had to pass through the staff room. And in the staff room everybody was sitting; Dr Sinha, Dr Kalimuddin Ahmed and other teachers. We filed through the staff room with the teachers sitting and staring at us. I was following the teacher in a docile manner. When we entered the room, he shut the door.

He asked me, “Well, tell me, who is your favourite novelist?”

I said, “Conrad”.

“What do you find good about Conrad,” he inquired.

I said, “He was an honest artist in spite of his conservative philosophy.”

There was a Marxist magazine that was published from London and once in a blue moon we’ll get a copy of that magazine. It was in that magazine that I had read about Conrad.

In response to my answer my teacher said, “There, there our quarrel starts. Why do you say that his philosophy was conservative? What has that to do with art?”

Then he asked me a volley of questions. I just kept quiet.

In came Dr Sinha, Dr R K Sinha. The teacher who was interrogating me and Dr Sinha were classmates and friends. Dr Sinha would address him by his first name. So naturally my teacher who had brought me there said, ‘You may go now’.

Later Dr Sinha told me, ‘The moment I saw you following him, I knew there was something wrong.

Many teachers in the university were like that. They would come, stop lecturing in the middle, sometimes repeating the points and most of the time they would end up without any kind of logical conclusions. There was no pattern or coherence in their lectures.