
अपने बेटे की शादी के सिलसिले में प्रमोद कुमार अपने गांव पहुंचे। निकट संबंधियों को आमंत्रित करना था। उनका गांव पटना से करीब 100 किलोमीटर पूरब गंगा नदी के किनारे बसा है। नाम है मोकामा। शादी पूना में हो रही थी। लड़की केरल की रहनेवाली थी। प्रमोद जी कार्ड लेकर सबसे पहले गये बड़का बाबू के यहां।
प्रमोद के पिता के पांचो भाईयों में सबसे बड़े थे बड़का बाबू। सत्तर के दशक में संयुक्त परिवार के मुखिया। सब लोग उस वक्त एक ही घर में रहते थे। एक ही चूल्हे पर 30 से भी ज्यादा लोगों का खाना बनता था। प्रमोद के बाबा (दादा) और मामा (दादी) तब जीवित थे। बड़का बाबू ही परिवार को चलाते थे। रोजमर्रा के आमद-खर्च की जिम्मेवारी और उसका हिसाब वही रखते थे। समय-समय पर होने वाले पर्व-त्यौहार व शादी-विवाह का जिम्मा भी उन्हीं के पास होता था। खेती की आमदनी के अलावा भाइयों को अपनी नौकरी की आमदनी का एक हिस्सा हरेक महीने बड़का बाबू को सौंपना पड़ता था। यही कारण था कि घर के कुछ लोग उन्हें ‘मालिक’ कहकर पुकारते थे।
प्रमोद जी ने ये सब अपनी आंखों से देखा था। वे उसी संयुक्त परिवार में पैदा हुए थे। बचपन से लेकर बीस वर्ष की उम्र तक वे संयुक्त परिवार की उसी हवेली में पले और बढ़े थे। उन्होंने बड़का बाबू उर्फ महेंद्र नारायण सिंह का रुतबा देखा था।
अस्सी के दशक तक सब-कुछ बदल गया। संयुक्त परिवार बिखर गया। भाइयों का घर, चूल्हा अलग हो गया। बड़का बाबू का रुतबा भी धीरे धीरे कम होने लगा।
2016 में जब प्रमोद जी उनके घर पहुंचे तब-तक बड़का बाबू देह से लाचार हो गये थे। चलना फिरना कम हो गया है। छत के ऊपर वाले कमरे में कभी कोई भाई, भतीजा मिलने चला आता है। पर वे खुद बाहर नहीं निकलते हैं। प्रमोद जी के मन में आज भी बड़का बाबू के लिए वही इज्जत है। सुबह-सुबह जब वे पटना से मोकामा पहुंचे तो उनका पहला पड़ाव था बड़का बाबू का घर।
पहुंचते ही उन्होंने चरणस्पर्श किया और पास वाली कुर्सी पर बैठ गये। हाल-चाल पूछने पर प्रमोद जी ने भेंट स्वरूप शादी का एक कार्ड थमा दिया। बाबू जी ने कार्ड को उलट पलट कर देखा। लड़की और उसके परिवार के बारे में जानकारी ली। फिर मुस्कुरा कर उन्होंने प्रमोद से पूछा,
“आंय हो, एगो बात बताहीं। तुम्हारी पत्नी अपने होनेवाली बहू से किस भाषा में बात करेंगी?”
प्रमोद जी के जवाब देने से पहले ही वे ठठाकर हंसने लगे। एक लम्बी पोपली हंसी। 85 वर्ष के बड़का बाबू के दांत सब झर गए थे। हंसते हुए उनके चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी। एक गहरे कटाक्ष की चमक।
प्रमोद जी बेचारे भी क्या कहते! उनके पास कोई जवाब नहीं था। असल में बड़का बाबू ने उत्तर जानने के लिए प्रश्न नहीं पूछा था। इस प्रश्न के द्वारा उन्होंने उस शादी पर कटाक्ष किया था। प्रमोद जी बड़का बाबू के चेहरे की चमक और पोपली हंसी को देखकर ही खुश थे। उन्होंने झट से अपना मोबाइल निकाला और एक फोटो खींच लिया।
इस घटना के दो साल बाद, 2018 में, जब बड़का बाबू का देहावसान हुआ तो उनका यही फोटो उनपर फूल चढ़ाने के काम आया।

इस कहानी के पात्र काल्पनिक हैं। पर सच्ची घटना पर आधारित ये कहानी हमारे समाज में तेजी हो रहे बदलाव का एक दिलचस्प नमूना है। बड़का बाबू और प्रमोद, समाज की दो अलग-अलग पीढ़ियों के प्रतिनिधि हैं। बड़का बाबू जैसे लोगों ने परिवार के ढांचे में परिवर्तन होते देखा है। कि कैसे संयुक्त परिवार धीरे धीरे एकल परिवार में बदलते चले गये। और परिवार में उनकी अपनी भूमिका कम होती चली गई। नब्बे के दशक तक बच्चों की शादियों पर उन लोगों का अच्छा खासा नियंत्रण था। शादियां वही तय करते थे, अपनी जाति, अपने समुदाय में। और वही अरेंज करते थे। लव मैरिज जैसे शब्द तब अपवाद थे।
उस समय प्रमोद जी की हिम्मत नहीं होती इस शादी के कार्ड को बड़का बाबू के सामने पेश करने की। बड़का बाबू इसका कड़ा विरोध करते। शादी अगर हो भी जाती तो उसके बहिष्कार का वे नेतृत्व करते। बिहार में अपनी जाति के अलावा किसी भी अन्य जाति के बीच शादियों की आप कल्पना नहीं कर सकते थे। और यहां तो लड़का और लड़की दो अलग-अलग राज्यों के थे। भाषा और संस्कृति में भी काफी अंतर था।
पर ये इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक था। बड़का बाबू की पीढ़ी अब समाप्त हो रही थी। इसीलिए वे केवल कटाक्ष करके रह गए।