अल्बैर कामू का उपन्यास अजनबी

फ्रांसीसी लेखक अल्बैर कामू का बहुचर्चित उपन्यास द स्ट्रेंजर 1942 में प्रकाशित हुआ। इसके हिंदी रुपांतरण ‘अजनबी’ के अनुवादक हैं राजेन्द्र यादव। राजकमल से प्रकाशित हुई है। ‘अजनबी’ पर अपने विचार प्रस्तुत कर रही हैं बन्दना।

अल्बैर कामू का उपन्यास अजनबी विश्व साहित्य के श्रेष्ठतम उपन्यासों में से एक माना जाता है। कहानी, किरदार, थीम, टेक्नीक, भाषा हरेक दृष्टिकोण से अप्रतिम। एक बार जब आप इसके लोक में प्रवेश करते हैं, तो खत्म करने के बाद ही रुकते हैं। कहानी का असर आपके ऊपर उसके बाद भी कई दिनों तक रहता है।

मैंने इसे पिछले सप्ताह खत्म किया। मेरे ऊपर इसका असर आज भी है। हमारे परिवार में अजनबी इतना लोकप्रिय हुआ कि इसी महीने तीन सदस्यों ने इसे तीन अलग-अलग भाषाओं में पढ़ डाला। मैंने हिंदी में, मेरे पति ने अंग्रेजी और बेटे ने मूल फ्रेंच में। फ़्रेंच में लिखे इस उपन्यास का हिंदी अनुवाद राजेन्द्र यादव ने किया है। राजकमल ने इसे प्रकाशित किया है। अंग्रेजी में इसका शीर्षक है द स्ट्रेंजर।

कहानी शुरू होती है उपन्यास के नायक मर्सो की मां की मृत्यु से। गांव के आश्रम से उसके लिए संदेश है:

“मां मर गई। आज। या शायद कल। मुझे पता नहीं।       गांव से एक टेलिग्राम आया था। लिखा था: ‘मां मर गई। कल अंत्येष्टि है। आपका विश्वासी।’ कुछ स्पष्ट नहीं है। मृत्यु शायद कल हुई।”

मर्सो अल्जीरिया की राजधानी अल्जीयर्स में रहता है। वहां एक कम्पनी के आफिस में क्लर्क है। उपन्यास उसी के जीवन की कहानी है। वही उपन्यास का कथावाचक भी है। मृत्यु की खबर मिलने पर वह अंत्येष्टि में शामिल होने गांव जाता है। वापस लौटने पर उसकी मुलाकात आफिस की भूतपूर्व सहकर्मी मेरी कार्डोना से होती है। दोनों एक-दूसरे के क़रीब आ जाते हैं। प्रेम पाश में बंध जाते हैं। सप्ताहांत में दोनों एक-दूसरे के साथ समय बिताने लगते हैं। फिर मर्सो की दोस्ती अपनी बिल्डिंग में रहने वाले रेमंड सिन्ते नामक व्यक्ति से होती है। उसके साथ मर्सो और उसकी प्रेमिका मेरी एक दिन समन्दर के तट पर जाते हैं। वहां मर्सो के हाथों एक व्यक्ति की हत्या हो जाती है। 

उसके बाद मर्सो की गिरफ़्तारी, उससे पूछताछ एवं जांच-पड़ताल का सिलसिला शुरू होता है। कोर्ट की लम्बी सुनवाई के बाद उसे जो सजा सुनाई जाती है, वह एकदम से चौंकाने वाला है: बीच चौराहे पर उसका सर क़लम कर दिया जाय।

यह सच है कि मर्सो ने गोली चलाई थी। इस बात को वह ख़ुद स्वीकार करता है। ऐसा उसने अपने बचाव में किया था। पर इतनी बड़ी सजा? बीच चौराहे पर सर क़लम किये जाने की? अपराध के अनुपात में इतना बड़ा दंड जज ने आखिर किन तथ्यों के आधार पर दिया? हमारे मन में ये प्रश्न स्वतः उभरने लगते हैं।

केस की सुनवाई के दौरान मर्सो के खिलाफ पेश किए गए तथ्य इस प्रकार थे: कि अपनी मां की अंत्येष्टि के दौरान मर्सो की आंखों में आंसू नहीं थे। मृत मां के चेहरे को देखने से उसने इंकार कर दिया था। शोक की बेला में उसने दूध वाली कॉफी पी थी। उसे ब्लैक कॉफी पीना चाहिए था। अंत्येष्टि के दो दिन बाद वह अपनी प्रेमिका के साथ कॉमेडी फिल्म देखने गया। और यह भी कि उसे ईश्वर में विश्वास नहीं है। इन्हीं बातों को आधार मानकर कोर्ट ने मर्सो को एक क्रूर अपराधी घोषित कर दिया। और उसे कठोरतम दंड दिया। मृत्युदंड।

कहानी के माध्यम से कामू ने दिखाने की कोशिश की है कि समाज के आगे व्यक्ति कितना विवश है। अपने अस्तित्व, अपनी खुशी की खातिर कैसे उसे समाज की परम्पराओं, उसकी धारणाओं के अनुरूप ढलना पड़ता है। अपने विवेक व विचारों से समझौता करना पड़ता है। और ऐसा नहीं करने पर उसकी दुर्गति हो सकती है। वैसे ही जैसे मर्सो की हुई।

मर्सो को मां से उतना ही लगाव था जितना किसी और बच्चे को होता है। कई मौकों पर उसे मां की याद आती है। पर क्या मां की मृत्यु पर आंसू बहाने, ब्लैक कॉफी पीने या ईश्वर में विश्वास जैसी मान्यताओं का अनुसरण करना उसके लिए जरूरी था? और क्या इन मान्यताओं के अनुसरण को उसके अपराध से जोड़ना उचित था? ये प्रश्न हमारे मन में बार-बार आते हैं। ये शायद आज के समाज के लिए भी उतने ही प्रासंगिक हैं।

कानून व्यवस्था की तो कामू ने कलई खोल कर रख दी है। उसने दर्शाया है कि समाज के पूर्वाग्रहों का न्यायिक व्यवस्था पर कितना गहरा असर है। मर्सो जैसा सच्चा व विवेकशील इंसान समाज के पाखंड के आगे कितना मजबूर है। वैसे तो द्वितीय विश्व युद्ध के समय लिखे गए इस काल्पनिक कहानी को अल्जीरिया या फ्रांस के संदर्भ में लिखा गया था। पर इसकी सच्चाई की गूंज हम आज के भारत में भी सुन सकते हैं।

दो खंडों में विभक्त अजनबी की कहानी को कामू ने बहुत ही बारीकी से बुना है। उपन्यास का पहला वाक्य है: ‘मां मर गई’ पाठक को यकायक कहानी से जोड़ लेता है। बाद की घटनाएं जैसे मर्सो का मेरी से प्रेम, ऑफिस में उसकी गतिविधियां, या फिर रेमंड से उसकी दोस्ती एक-के-बाद-एक आती रहती हैं। कहानी की गति इतनी तेज कि हम जल्द ही पहले खंड के अंत तक पहुंच जाते हैं। हालांकि अंत आते-आते अचानक हम चौंक पड़ते हैं। हत्या की एक घटना से। जो सनसनीखेज है पर काव्यात्मक भी। अंतिम पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैं:

“…घोड़ा दब गया। मैंने रिवाल्वर के मुलायम हत्थे के कम्पन को महसूस किया ….. मुझे मालूम था कि मैंने सागर तट की उस व्यापक शान्ति को भंग किया था। वही शान्ति जिसमें मैं खुश था … उसके बाद उस निर्जीव शरीर पर मैंने चार गोलियां और चलाई। सुख के दरवाजे पर लगातार चार कर्णभेदी दस्तक की तरह।”

दूसरे खंड में हमारी उत्सुकता बढ़ जाती है। और कहानी तेज गति से बढ़ती रहती है। मैजिस्ट्रेट से मर्सो की बातचीत, जेल में उसके अनुभव या कोर्ट की सुनवाई। कोई भी भाग ऐसा नहीं है जो अनावश्यक लगता है। सब-कुछ नपा तुला। अंतिम अध्याय में पादरी के ऊपर मर्सो के ग़ुस्से का अचानक फूट पड़ना उपन्यास का चरमोत्कर्ष है। यह हमें झकझोर कर रख देता है। इसके बाद नायक के अपराध और उसकी सजा से जुड़े विचार हमारे मन को कचोटते हैं। व्यक्ति और समाज के सम्बन्धों व जीवन के अर्थ जैसे विषयों के बारे में सोचने को मजबूर करते हैं।

फिर उपन्यास के शीर्षक का महत्व भी समझ में आने लगता है। स्पष्ट हो जाता है कि लीक से हटकर चलने वाला उपन्यास का नायक मर्सो सचमुच एक अजनबी था। उसकी कहानी समाज और उसकी स्थापित व्यवस्था पर एक करारा प्रहार है।

Published by Arun Jee

Arun Jee is a literary translator from Patna, India. He translates poems and short stories from English to Hindi and also from Hindi to English. His translation of a poetry collection entitled Deaf Republic by a leading contemporary Ukrainian-American poet, Ilya Kaminski, was published by Pustaknaama in August 2023. Its title in Hindi is Bahara Gantantra. His other book is on English Grammar titled Basic English Grammar, published in April 2023. It is is an outcome of his experience of teaching English over more than 35 years. Arun Jee has an experience of editing and creating articles on English Wikipedia since 2009. He did his MA in English and PhD in American literature from Patna University. He did an analysis of the novels of a post war American novelist named Mary McCarthy for his PhD

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