
पिछले सप्ताह सूचना मिली कि आशियाना नगर निवासी डॉ सुरेश प्रसाद की मृत्यु हो गई। मुझे लगा कि ऐसा कैसे हो सकता है? डॉ सुरेश प्रसाद तो एक कवि थे। और कवि की मृत्यु नहीं होती। उनका देहावसान ज़रूर हो सकता है। डॉ साहब की उम्र करीब 90 के आसपास थी। उनके देह का अवसान स्वाभाविक था। पर कवि सुरेश प्रसाद जीवित हैं। आगे भी रहेंगे। अपने शब्दों, छंदों एवं अपनी संगीतमय रचनाओं में।
डॉ प्रसाद मूलतः एक चिकित्सक थे। अपने ज़माने के मशहूर बाल चिकित्सक। लेकिन मन और मिज़ाज से वे एक कवि थे। कविता उनके रग-रग में भरी थी। मुझे तो लगता है कि वे अपने मरीजों की पर्चियों में भी कविता की एक खुराक़ जरूर देते होंगे। लिखते होंगे कि अन्य दवाओं के साथ इस प्रेम कविता का दो-दो चम्मच सुबह-शाम पियो। अपने बाल मरीजों को करुणा, वात्सल्य इत्यादि से लबालब कविताओं की खुराक़ भी सुनिश्चित करते होंगे।
2023 में पहली बार मुझे सुरेश प्रसाद की रचनाओं के बारे में जानकारी मिली। उनके बड़े लड़के राजीव रंजन प्रसाद ने मुझे व्हाट्सएप पर एक फोटो भेजा था जिसके नीचे लिखा था: ‘चाय (महाकाव्य) पढ़िए’। मुझे लगा राजीव जी ने शायद मुझे चाय पे बुलाया है। ‘पढ़िए’ को मैंने पीजिए समझ लिया था। राजीव जी ख़ुद एक शिक्षाविद् हैं। बिहार सरकार के शिक्षा विभाग में उच्च पदों पर रहकर उन्होंने शिक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
उसी दिन राजीव जी जब शाम में मिले तो उन्होंने ‘चाय (महाकाव्य)’ के बारे में जानकारी दी। यह एक पुस्तक है। उनके पिता डॉ सुरेश प्रसाद की एक रचना। ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन) दिल्ली से छपी है। अगले दिन राजीव जी ने सचमुच मुझे चाय के साथ चाय (महाकाव्य) की एक प्रति उपहार स्वरूप दिया। क़िताब को देखकर, पढ़कर मैं अभिभूत हो गया।
इस महाकाव्य के प्रकाशन की कहानी दिलचस्प है। राजीव जी ने बताया कि जब इसकी पांडुलिपि तैयार हो गई तो सुरेश प्रसाद इसे लेकर हिंदी के महान कवि सुमित्रानंदन पंत के घर पहुंचे। यह 1977 की बात है। राजीव जी भी साथ में थे। अंदर उन्होंने जब अपना कार्ड भिजवाया तो सुमित्रानंदन पंत बाहर निकले। पूछा कि आप ही हैं डॉ सुरेश प्रसाद? उन्होंने कहा हां। पंत जी उनसे कहा कि हमारे यहां कोई मरीज़ तो है नहीं। आप किससे मिलना चाहते हैं? फिर डॉ साहब ने अपनी चाय पर लिखी इस किताब की पांडुलिपि को उनके सामने पेश किया। पंत जी उसे देखकर काफ़ी प्रभावित हुए। पढ़ने के बाद उन्होंने इस महाकाव्य की भूमिका भी लिखी। भूमिका में सुमित्रानंदन पंत कहते हैं:
“मैं डॉ सुरेश प्रसाद को बधाई देता हूं कि उन्होंने अपनी ललित भावभीनी भाषा की प्याली में चाय रूपी औषधि भरकर लोगों का उपकार किया। सिंधु मंथन के कारण ही अमृत के बदले चाय की ही प्याली निकली होगी। इस काव्य को पढ़कर मुझे रत्तीभर संदेह नहीं रहा।”
गुज़रे ज़माने के उन महान साहित्यकारों, कवियों, लेखकों की एक फेहरिस्त है जिन्होंने अपने शब्दों से इस पुस्तक को सुशोभित किया है। उनमें महादेवी वर्मा से लेकर हजारी प्रसाद द्विवेदी, वियोगी हरि, हरिवंशराय बच्चन, राजेन्द्र अवस्थी, अशोक चक्रधर, काका हाथरसी, रामदयाल पांडेय… असल में लिस्ट काफी लंबी है।
महादेवी वर्मा लिखती हैं: “डॉ सुरेश प्रसाद ने महाकाव्य के लिए सर्वथा नवीन विषय चुना है। उससे अनेक व्यक्ति चौंकेंगे और अपने चायपाई आनंद भी प्राप्त करेंगे।” वैसे महादेवी जी के उन अनेक व्यक्तियों में मैं भी एक हूं।
रामदयाल पांडेय द्वारा लिखी गई तीन पृष्ठों की इसकी भूमिका का शीर्षक है ‘असाधारण महाकाव्य’।
पांच सौ से भी अधिक पृष्ठों वाली इस पुस्तक में डॉ सुरेश प्रसाद ने चाय की उत्पत्ति से लेकर इसके पीने वाले के कप तक पहुंचने की विभिन्न प्रक्रियाओं का विस्तार से वर्णन किया है। विज्ञान की अपनी जानकारी को उन्होंने सुन्दर ढंग से इन कविताओं में व्यक्त किया है।
इस महाकाव्य के अलावा डॉक्टर प्रसाद की दूसरी प्रमुख रचना का शीर्षक है ‘एक और मधुशाला’। असल में यह हरिवंशराय बच्चन के प्रसिद्ध महाकाव्य ‘मधुशाला’ को एक जवाब था। उन दिनों बच्चन जी की ‘मधुशाला’ काफ़ी लोकप्रिय हो रही थी। डॉक्टर होने के नाते डॉ सुरेश प्रसाद मदिरा के स्वास्थ्य पर होने वाले दुष्प्रभाव से भलि भांति अवगत थे। उनके अनुसार बच्चन की मधुशाला मदिरा का महिमा मंडन कर रही है। इसीलिए उन्होंने ‘एक और मधुशाला’ की रचना की। मदिरा के स्थान पर वह लोगों में चाय को लोकप्रिय बनाना चाहते थे।
इस सम्बन्ध में डॉ सुरेश प्रसाद का हरिवंशराय बच्चन से पत्राचार के साथ साथ काव्यात्मक नोंक-झोंक भी हुआ था। डॉ प्रसाद ने इस पत्राचार को हरिवंशराय बच्चन की सहमति से ‘एक और मधुशाला’ में संलग्न किया है।
इन दो किताबों के अलावा डॉ सुरेश प्रसाद की अन्य भी कई किताबें हैं। उनकी रचनाशीलता से जुड़े कई किस्से हैं, कहानियां हैं…